निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० २ अ० २ पा० ३ खं० । 'तत्' प्रसिद्धं 'परमम्' उत्कृष्टं 'पदम्' स्थानम् 'भूरि' बहु 'अवभाति' सर्वम् अधः कृत्वा दीप्यते इत्यर्थः । अनुवादः । मन्त्रार्थ-हे दम्पती ! उन स्थानोंको तुम दोनोंके जानेके लिये हम चाहते हैं। जहां बहु प्रकाश गमनशील किरणें हैं । और जहां बड़ी गतिवाले विष्णुदेवका उत्तमोत्तम स्थान सब संसारको नीचे करता हुआ प्रकाश कर रहा है । [भा० र्थ०-] तुम दोनोंके लिये उन स्थानोंको चाहते हैं, गमनके अर्थ। जहां गो या किरणें बहु शृङ्गवालीं। [एक पद निरुक्त] 'भूरि यह बहुतका' नाम है। 'प्रभवति' समर्थ होता है, इस कर्तृवाच्य 'प्र' उपसर्ग 'भू' । [भ्वा० प० ] धातुसे । 'शृङ्ग' श्रिश्रू सेवायाम् (भ्वा० उ० ) धातुसे, अथवा 'शल' हिंसायाम् [क्या० प०] धातुसे । अथवा 'शम्' उपशमे .(क्या० प०) धातुसे अथवा शरण या हिंसाके लिये उठा है,-इससे या शिरसे निकला हुआ है, इससे[ शृङ्ग] है। 'अयासः' गमन करने वाले वहां वह 'उरु- गाय' या महागति 'वृषन्' या विष्णुका 'परम' या सबसे ऊंचा 'पद' स्थान सबको नीचा करता हुआ बहुत प्रकाश करता है । 'पाद' शब्द 'पद'गतौ ( दिवा० आ०) धातुसे है । उसके रख देनेसे पद होजाता है। पशुके पादके सादृश्यसे रुपये या मुहर आदि द्रव्य का पाद होता है। उसके पादके सादृश्यसे और क्षेत्र आदिके पद होते हैं । इसी प्रकार और द्रव्योंके भी सन्देह हैं। जो वे समान क्रिया वाले हों, तो उनके एकसे निर्वचन करना, यदि भिन्न भिन्न कर्म या क्रिया वाले होंतो,भिन्न भिन्न निर्वचन करना। प्रयोजन के अनुसार निर्वचन करना चाहिये।