निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
६० २ अ० २ पा० ३ खं० । 'तत्' प्रसिद्धं 'परमम्' उत्कृष्टं 'पदम्' स्थानम् 'भूरि' बहु 'अवभाति' सर्वम् अधः कृत्वा दीप्यते इत्यर्थः । अनुवादः । मन्त्रार्थ-हे दम्पती ! उन स्थानोंको तुम दोनोंके जानेके लिये हम चाहते हैं। जहां बहु प्रकाश गमनशील किरणें हैं । और जहां बड़ी गतिवाले विष्णुदेवका उत्तमोत्तम स्थान सब संसारको नीचे करता हुआ प्रकाश कर रहा है । [भा० र्थ०-] तुम दोनोंके लिये उन स्थानोंको चाहते हैं, गमनके अर्थ। जहां गो या किरणें बहु शृङ्गवालीं। [एक पद निरुक्त] 'भूरि यह बहुतका' नाम है। 'प्रभवति' समर्थ होता है, इस कर्तृवाच्य 'प्र' उपसर्ग 'भू' । [भ्वा० प० ] धातुसे । 'शृङ्ग' श्रिश्रू सेवायाम् (भ्वा० उ० ) धातुसे, अथवा 'शल' हिंसायाम् [क्या० प०] धातुसे । अथवा 'शम्' उपशमे .(क्या० प०) धातुसे अथवा शरण या हिंसाके लिये उठा है,-इससे या शिरसे निकला हुआ है, इससे[ शृङ्ग] है। 'अयासः' गमन करने वाले वहां वह 'उरु- गाय' या महागति 'वृषन्' या विष्णुका 'परम' या सबसे ऊंचा 'पद' स्थान सबको नीचा करता हुआ बहुत प्रकाश करता है । 'पाद' शब्द 'पद'गतौ ( दिवा० आ०) धातुसे है । उसके रख देनेसे पद होजाता है। पशुके पादके सादृश्यसे रुपये या मुहर आदि द्रव्य का पाद होता है। उसके पादके सादृश्यसे और क्षेत्र आदिके पद होते हैं । इसी प्रकार और द्रव्योंके भी सन्देह हैं। जो वे समान क्रिया वाले हों, तो उनके एकसे निर्वचन करना, यदि भिन्न भिन्न कर्म या क्रिया वाले होंतो,भिन्न भिन्न निर्वचन करना। प्रयोजन के अनुसार निर्वचन करना चाहिये।
हिन्दी निरुक्त। ६१ ये इक्कीस (२१) पृथ्वोके नाम गिने गये हैं;। उनमें निर्ऋ- ति' शब्द निरमणं या सुख पहुंचानेसे-[ पृथिव्याः नाम ] [ 'रमु' 'क्रीड़ायाम्' ( भ्वा० आ० ) धातुसे ] दूसरी निऋति कष्ट- की आपत्ति है, जो 'ऋच्छ' इन्द्रिय प्रलये (तु० प० ) धातुसे है। वह पृथिवीके साथ सन्दिग्ध होती है । उन दोनों का भेद है। उसकी [ कृच्छ्रापत्ति और पृथिवीकी भी ] यह निर्वचन करने वाली ऋचा है ॥ ३ ॥— व्याख्या— “तांवां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्रगावो भूरि शृङ्गा अयासः॥ अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पद मवभाति भूरि ॥” [ ऋ० सं०-२, २, २४, ६ ] दीर्घतमस् ऋषि । विष्णु देवता । त्रिष्टुप् छन्दः । रथके अव- धानमें तथा सोमातिरेक शस्त्रमें विनियोग । इस मन्त्रमें यजमान और यजमान-पत्नी दोनोंके लिये आशीर्वाद है। ऋत्विज् कहते हैं कि—'हम तुम दोनोंके जानेके लिये उन निवास स्थानोंकी कामना करते हैं, जिनमें बहुत दीप्तिवाले निरन्तर फिरनेवाले तथा महागति (तीब्र निरन्तर एवम् बहुत दूर तक चलने वाले ) रश्मियें या किरणें हैं, भगवान् विष्णुका परम पद या आदित्य-मंडल रूप स्थान, सम्पूर्ण जगत्को अपनेसे नीचे करके अत्यन्त प्रकाशित होता है। अथ एक-निरुक्तम् । (१) “भूरि” यह बहुतका नाम है। क्योंकि-देनेसे वह बहुत होता है । (२ “शृङ्ग” 'श्रिञ्सेवायां' धातुसे बनता है । क्योंकि वह शिरमें आश्रित होता है । अथवा 'शृहंसायाम्' धातुसे
६२ ३ अ० २ पा० ३ खं० । 'शृङ्ग' शब्द बनता है, क्योंकि-सींग वाला पशु उसीसे मारता है । अथवा शिरसे निकलता है, इससे वह शृङ्ग है । अथवा परमपूज- नीय स्थानमें स्थित होता है, इससे वह 'शृङ्ग' है । ( ३ ) 'पद' 'पद' गतौ' धातुसे 'पाद' शब्द [ जो पैरका नाम है ] बनता है, क्योंकि, उससे ही, शरीर धारी चलते हैं, और पादके धूलिया कीच आदिमें धरनेसे जो वैसीही आकृति उत्पन्नहो जाती है, वह पद कहाता है । चाहे वह पशुकाहो या मनुष्यका । पद शब्द पन्द शब्दसे बनता है, और वह खोज का नाम है । प्रसक्तानु-प्रसक्त । पाद नाम किसी भी वस्तुके चतुर्थांशका है, उसीके सादृश्यसे पशुके पैर को पशु-पाद कहते हैं, क्योंकि,-वहभी पशुका चौथा भाग जैसा प्रतीत होता है । एवम् उसीके सादृश्यसे दीनार (अशरफी) आदि मुद्राओंके चतुर्थांशको भी 'दीनार पाद' आदि नामसे बोलते हैं, ये प्रभाग पाद कहाते हैं । इन प्रभाग पादों- की समानतासेही और और वस्तुभी पाद कहाते है, जैसे ग्रन्थ पद, क्षेत्रपद, आदि । क्योंकि उनमेंभी उसी प्रकारसे विभाग है । सुतराम्, 'पद' शब्दका मूल 'पाद' शब्द है । उपसंहार । इसी प्रकार और और शब्दोंमेभी सन्देह होते हैं, केवल गो शब्दका पद शब्दमें ही नहीं । उन सभी स्थानोमें निर्वचनका स्वा- भाविक लक्षण यह है कि "वे यदि समान क्रियावाले हों"तो उनका समानही निर्वचन करना चाहिये, और यदि भिन्न भिन्न क्रिया,युक्तहों तो भिन्न भिन्न प्रकारसे निर्वचन करना, इसी रीतिसे निर्वचन होता है।"
हिन्दी। निरुक्त । ६३ उदाहरण । ये 'गौः' आदि २१ पृथिवीके नाम गिनाये हैं, इनमें एक 'निऋ- ति' शब्द है । वह पृथिवी और दुःख देवताका नाम है । उन दोनोंका कर्मसे यह भेद है कि उनमें एक पृथिवी अपने में आये हुए प्राणियोंको सुख देनेवाली है, और दूसरी पाप-देवता, दुःख देने- वाली । इससे उस एकही 'निऋति' शब्दका निर्वचन अर्थके उद्दे- श्यानुसार दो प्रकारसे होता है। अर्थात्-पृथिवीके लिये 'नि' उप- सर्ग और 'रमु, क्रीडायाम्' (भ्वा० आ०) धातुसे और दुःख देवताके उद्देश्यसे दुःखार्थक 'ऋच्छ' [तु० प०] धातुसे निर्वचन होता है । देखो ! आगेजो ऋचा दिखाई जाती है, उसमें निऋति शब्दके आधार पर पृथिवी और दुःख देवताके अभिप्रायसे दो व्याख्यान होते हैं, जिनमें प्रत्येक व्याख्यान 'निऋति' की भिन्न भिन्न व्याख्या करनेमें साक्ष्य देता है ॥ ३ ॥ [ ख० ४ ] "यईं चकार न सो अस्यवेद यईं ददर्श हि रुगिन्नु तस्मात् । समातु र्यो ना परिवीतो अन्तर्बहु प्रजा निऋति माविवेश ॥” (भा०) 'बहु प्रजाः कृच्छ्रम्-आपद्यते' - इति परिव्रा- जिकाः । 'वर्षकर्म' इति नैरुक्ताः । "यईं चकार" इति करोति-किरती सन्दिग्धौ वर्ष कर्मणा । "नसो अस्यवेद" मध्यमः । सएव अस्यवेद-मध्यमः,-यो ददर्श आदित्यो पहि- तम् । समातुर्यो नौ । माता अन्तरिक्षम् !
६४ २ अ० २ पा० ४ खं० । निर्मोयन्ते अस्मिन् भूतानि । योनिः-अन्त रिक्षम् महानवयवः । “परिवोतः” वायुना । अयमपि इतरो योनिः,-एतस्माद्-एव । परिवृतो भवति । “बहु प्रजाः” भूमिम्- आपद्यते वर्ष कर्मणा । शाकपूणिः संकल्पयां चक्रे-'सर्वा देवता जाना- मि'-इति । तस्मै देवता उभयलिङ्गा प्रादुबर्भूव । तां न जज्ञे । तां प्रपच्छ 'विविद् घाणित्वा'-इति । सा अस्मै —'एतात् ऋचम् आदि देश एषा मद्दैवता'— इति ॥ ४ ॥ “यईं चकार”-इति । दीर्घतमसः आर्षम् । त्रिष्टुप् । महाव्रते वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।” अनुवाद । मन्त्रार्थ-‘निऋॄंति’ शब्दकी दुःख वाचकताके पक्षमें-जो मनुष्य गर्भको करने वाला है, वह इसके तत्त्वको नहीं जानता, बल्कि-वह जो इस गर्भ या जन्तुको पेटके या शरीरके भीतर अध्यात्म-बुद्धिके द्वारा देखता है, यथार्थ रूपसे जानता है। वह गर्भका उत्पन्न करने वाला पुरुष माताको योनि या गर्भ स्थानमें माताके खाये, पीये, चक्खे और चबाये हुए अन्नादिके परिणामसे पुष्ट होता है, तथा समय पर जरायु (जेर) से लिपटा हुआ जन्मता है । अनन्तर, इसी प्रकार, अनेक बार जन्म लेता हुआ, दुःखको प्राप्त होता है । अर्थात् यह गर्भतत्त्वके न जानने वालोंकी गति है । इस व्याख्यामें गर्भ कर्त्ताके लिये ‘निऋॄंति’ को प्राप्तिही फल दिखाया है, और वह दुःखही होसकता है, इस रीतिसे यह व्याख्यान ‘निऋॄंति’ शब्दके
हिन्दी निरुक्त । ३९ दुःखार्थक 'ऋच्छ' धातुसे निर्वचन करनेमें नियम या सहायक होता है । और—'निऋ'ति' शब्दको भूमि वाचकता पक्षमें-जो पुरुष इस वृष्टिका करनेवाला या फेंकने वाला मेघ है'-जानता है; वह इसके तत्वको नहीं जानता । बल्कि-वह, जो आदित्यकी रश्मियोंके भी- तर छिपी हुई वृष्टिको देखता है, जानता है । वह मेघ, माता या अन्तरिक्षके योनि = एक देशमें वायुसे घिरा हुआ, वर्षा कालमें बहुरूपसे उत्पन्न होता हुआ भूमिमें आता है। इस व्याख्यामें मेघ 'निऋ'ति' को आता है, और वह भूमिही, होसकती है, इस लिये उसीके अनुसार 'निऋ'ति' शब्दका निर्वचनभी 'निरमण' क्रियासेही होना उचित है । यही "यथार्थं निर्वक्तव्यानि" [ नि०-अ० २, पा० २, खं० ३ ] इस वचनका तात्पर्य है। [भाष्यार्थ-] [प्रथम अर्थके पक्षपाती-] 'बहुत सन्तानोंका उत्पन्न करने वाला' दुःखको प्राप्त होता है, ऐसा सन्यासी मानते हैं। [प्रयोजन-उन्हींकी दृष्टिसे इस मन्त्रमें ऐसा अर्थ दिखाई देता है ] [ दूसरा पक्ष-] 'इस मन्त्रमें वर्ष कर्म या वृष्टिका वर्णन है' यह निरुक्त शास्त्रके पण्डित मानते हैं । [इनके मतमे'] 'बई' चकार" यहां वर्ष कर्मके साथ 'चकार' पदमें 'डुकृञ्' करणे ( तना० उ० ) धातु और 'कृ' विक्षेपे ( तु० प० ) धातुका सन्देह है। [क्योंकि, यह रूप दोनोंसे समानही बनता है, और दोनोंके अर्थ भी संगत होजाते हैं । जैसेकि, वर्षाको करता है, या, फेंकता है । ] वह इसको नहीं जानता, जो देखता है,-'मध्यम या मेघ है'। जो देखता है-'आदित्यमें छिपे हुएको, [वह जानता है। "मातुर्योनौ"-माताकी योनिमें । 'मातः' नाम अन्तरिक्ष । [क्योंकि-] इसमें भूत ( प्राणी ) निर्माण किये जाते हैं। 'योनि' नाम अन्तरिक्ष या उसके छोटे भागका है । वह बड़ा और अनव-
यव या भाग रहित है । घिरा हुआ—वायुसे । यह भी दूसरा स्त्रीका योनि, इसी व्याख्यासे है । [ क्योंकि-वहभी जोरसे लिपटा हुआ होता है। बहुत प्रकारसे होता हुआ भूमिको प्राप्त होता है – यह वर्ष कर्मसे [ व्याख्या है । ] निर्वचनके सम्बन्धमें सन्देहस्थलका एक वैदिक इतिहास । शाकपूणि आचार्यने सङ्कल्प किया कि—'मैं सब देवताओंको जानता हूँ' । उसके सामने एक, दो प्रकारके चिन्हवाली देवता, जिसमें स्त्री और पुरुष दोनोंके चिन्ह थे, अथवा मध्यम लोकके देवता और द्युलोकके देवताके चिन्ह थे, प्रकट हुई । उसको उसने, न जाना । उसको पूछा कि-'मैं तुझे जानना चाहता हूँ'। उसने इसे यह ऋचा दी और कहा कि—"यह ऋचा 'मद्देवता' है, अर्थात् इस ऋचाकी मैं देवता हूं, तू इसके द्वारा मुझे जान सकेगा।' क्योंकि,—तू नैरुक्त है ॥ ४ ॥ व्याख्या— भाष्यकारने “य ईं चकार” इस ऋचाके चौथे पादकी व्याख्या दोनों मतोंके अनुसार इस मन्त्रके भाष्यके आदि और अन्तमें दिखाई है–"बहुप्रजाः कृछ्रमापद्यते इति परिव्राजकाः” “बहुप्रजा भूमि मा पद्यते, वर्ष कर्मणा”। और जो बीचमें भाष्य है, वह शेष तीन पादोंका है, और वह वर्षकर्म या नैरुक्त मतके अनुसार है । भाष्य अन्वयानुसार नहीं है, किन्तु फुटकर पदोंका है, भाष्य देखते समय मन्त्र पर दृष्टि रखनी चाहिये, ऐसे ही भाष्यसे सहायता मिल सकती है । परिव्राजक पक्षमें 'माता' नाम जननी, और 'योनि' नाम स्त्री- योनिका है। नैरुक्त मतमें 'माता' नाम अन्तरिक्ष, और 'योनि' नाम उसके एक देश ( एक भाग) अन्तरिक्षका है। मन्त्रमें दोनों ही पक्षोंमें 'चकार' क्रियाके साथ 'गर्भम्' या 'वर्षम्' कर्म अध्या-
[Header] हिन्दी निरुक्त । ६७ हारसे लिया जाता है। 'तस्मात्' पद 'तस्य' (उसका) पदका अर्थ देता है, और 'हिरुक्' अभ्यन्तरका । "नसो अस्य वेद, मध्यमः" इसको 'सः अस्य न वेद, यः मध्यमो वर्षस्यकर्त्ता, इति वेद' 'वह इसको नहीं जानता, जो समझता है,- इस वर्षका करनेवाला मध्यम या मेघ है' ऐसा अन्वय कल्पित करके समझना चाहिये । इसी प्रकार "स एव अस्य वेद, मध्यमः" कोऽर्थः—सएव अस्य तत्वं जानाति, अय मध्यम इति, "यः आदित्योपहितम्, ददर्श" पश्यतीत्यर्थः । 'वही पुरुष इसके तत्वको जानता है, कि 'यह मध्यम है', जो आदित्य या उसकी रश्मियोंके भीतर उसे देखता है' ऐसे अन्वयकी योजनासे देखना होगा । अविद्यमानाः अवयवाः यस्य सः अनवयवः, महांश्चासौ अन- वयवः, महानवयवः । जिसके अवयव या खण्ड न हों, उसे अन- वयव कहते है, और महान् अनवयवको 'महानवयव' । यह दोनों विशेषण अन्तरिक्ष या आकाशके हैं। बड़ा इससे है कि-इसमें संसार समाया हुआ है, और अनवयव इससे है कि, इसमें घट, पट, शरीर आदि पदार्थोंके समान जोड़ नहीं है। कहींसे भी इसके दो भाग नहीं हो सकते। भाष्यमें 'योनिः' पदके साथ इसका सम्बन्ध है। "बहु प्रजाः ।" मेघ पक्षमें 'बहु यथास्यात् तथा प्रजायते'- इति 'बहु प्रजाः' । बहु जैसे हो, वैसे होनेवाला । जब होता है, सब पृथिवी और जलाशयोंमें सर्वत्र जल ही जल व्याप्त हो जाता है । गर्भपक्षमें—'बहवः प्रजाः यस्य, सः बहुप्रजाः' बहुत हैं, प्रजा या अपत्य जिसके, वह बहुसन्तान पुरुष 'बहुप्रजाः' है। भगवद्दुर्गाचार्यने छात्रोको मर्मज्ञ बनानेके लिये इसी ऋचाके
६८ २ अ० २ पा० ४ खं० । जोड़कर एक और मन्त्र दिखाया है, और उस पर बहुत अच्छी टिप्पणी की है, हम उसे नीचे दिखा देते हैं:— आप कहते हैं कि—'इस प्रकार इस मन्त्रमें नैरुक्तोंके मतमें ‘निर्ऋति’ शब्दसे भूमि और परिव्राजकोंके मतमें कृच्छ्रापत्ति कही जाती है, सो इसी प्रकारसे मन्त्रोंमें शब्दकी गतिके वैभवसे दोनों ही अर्थ घट जाते हैं, वैसे ही “दधि क्राणों अकारिषम्” [ ऋ० सं०-३, ७, १३, ६ ] यह मन्त्र है । इसके तीन स्थानोंमें विनियोग है,—( १ ) अग्निहोत्रमें अग्निके उपस्थानमें, ( २ ) अग्निष्टोममें दधिके भक्षणमें, और-( ३ ) अश्वमेधमें अश्वके समीपमें महिषी ( यज- मान-पत्नी ) के खड़े हो जाने पर अन्य पत्नियोंके जप करनेमें । वहां प्रत्येक विनियोगके साथमें इसका अन्य अन्य अर्थ ही होना चाहिये । क्योंकि-कर्ममें मन्त्रका अपने अर्थके द्वारा उसका स्मरण करना ही प्रयोजन है । और इसीसे ये मन्त्र वक्ताके अभिप्रायके अनुसार अन्यत्व या भिन्नताको धारण करते हैं, इनमें अर्थकी इयत्ता या परिमाण नहीं है, क्योंकि-ये महार्थ या अमोघ अथवा अपरिमित अर्थ वाले होते हैं । तथा दुष्परिज्ञान या बड़ी कठि- नाईसे जाने जा सकते हैं, जिस प्रकार घोड़ा सवारकी विशेषतासे अच्छा और बहुत अच्छा चलता है, वैसे ही ये मन्त्र वक्ताके प्रकर्षसे साधु और साधुतर अर्थोंको भरते हैं । इससे अध्ययन करनेवालोंको यह सार लेना चाहिये कि-इस शास्त्रमें एक शब्दका जो निर्वचन किया जाता है, वह लक्षण मात्र अथवा नाम मात्र है । कहीं कहीं अध्यात्म, अधिदैव और अधि- यज्ञ अर्थके दिखानेके लिये व्याख्या है । किन्तु जितने अर्थ अध्यात्म, अधिदैव और अधियज्ञमें घटनेवाले युक्तिसे सिद्ध हों, वे सभी योजनीय हैं, इसमें कोई अपराध नहीं है । यास्क रने जो कुछ चमत्कार इस ग्रन्थमें रखा है, उसे हम देख नहीं सकते, अथवा जितना ध्यान देंगे, उतना ही देख सकेंगे ।
इसके अनुसार हम देखते हैं कि—उपर्युक्त उदाहरणोंसे निर्वचनके विशालरूपको सन्मुख खड़ा करनेमें कोई त्रुटि नहीं रखी गई है, तथापि, पामर, मन्द—बुद्धि लोग कह सकते हैं कि, ऋषि ने जैसा अर्थ परिव्राजक और नैरुक्तोंके मतभेदसे दिखाया है, यह सब आधु- निक लौकिक कल्पना है, ऐसा वेदमें सम्भव नहीं, उस आपत्तिको समूल नष्ट करनेके लिये एक वैदिक इतिहास दिखाकर इस प्रसङ्गके साथ पादको समाप्त कर देते हैं। शाकपूणि ऋषिका जो सङ्कल्प हुआ, और उनके उस अहङ्कारको दूर करनेके लिये देवताने प्रादुर्भूत होकर जो ऋचाके द्वारा उत्तर दिया है, वह मार्मिक पुरुषोंको मनोगत करने योग्य है। जब ऋचा हीसे देवताने उत्तर दिया और वह शाकपूणिके देवता-परिज्ञानको अल्प ठहरानेके लिये ही है तो, इससे स्पष्ट ही प्रतीत होता है, कि,- वेदको अपना अर्थ अमोघ तथा अपरिमित अभीष्ट है ॥ ४ ॥ । (खण्ड ५) “अयं स शिङ्क्ते येन गौरभी वृत्ता मिमाति मायुध्वंसनावधिश्रिता । साचित्तिभिर्नियि चकार- मर्त्यं विद्युद् भवन्ती प्रति वव्रिमौहत” ॥ [ भाष्यम्-] अयं स शब्दायते, येनगौः-अभिपवृत्ता मिमाति मायुं शब्दं करोति, मायुमिव-आदित्यम्,- इति वा । वाग्-एषा माध्यमिका । ध्वंसने मेघे अधिश्रिता । सा चित्तिभिर्निरकरोतिमर्त्यं विद्युद् भवन्ती । प्रत्यूहते—वव्रिम् । "वव्रिः"—इति-
रूपनाम, —वृणोति—इति सतः । वर्षेण प्रच्छाद्य पृथिवीं तत् पुनः—आदत्ते ॥ ५ ॥ अन्वयार्थः-“अयं सः” मेघः “शिङ्क्ते” शब्दा- यते’ शब्दं करोति, “येन” मेघेन “अभीवृत्ता” ‘अभिमवृत्ता’ सती “ध्वंसनावधिश्रिता” ‘ध्वंसने मेघे अधिश्रिता’ सती च । “गौः” ( २,२, १) ‘एषा’ ‘माध्यमिका’ ‘वाक्’ “मायुं” “मिमात्ति” ‘मायुं शब्दं करोति’ । अथवा मायुम्’ ‘आदित्यमिव’ ‘आत्मानं ‘मिमाति’ निर्वर्त्तयति इत्यर्थः । ततः “सा” ‘विद्युद्’ भवन्ती “चित्तिभिः” चयूचटा शब्दैः “मर्त्यं” मनुष्यम् “नि (हि)चकार” ‘निकरोति’ भीष- यते इत्यर्थः । ‘पुनः’ ‘वर्षेण पृथिवीं प्रच्छाद्यतत्’ “वव्रिम्” रूपं “प्रति-औहत” ‘प्रत्यूहते’ ‘आदत्ते’ उपसंहरति—इत्यर्थः । मन्त्रार्थः-वह यह मेघ शब्द करता है, जिससे प्रवृत्त हुई हुई और मेघमें छिपी हुई मध्यमलोककी वाग्देवता शब्द करती है, अथवा अपनेको सूर्यके समान बना लेती है। फिर विद्युत् [बिजली] रूप धारण कर चटचटा शब्दोंसे मनुष्योंको डराती है, और फिर वर्षासे पृथिवीको ढाँप कर अपने रूपको छिपालेती, या लौटा लेती है ।
हिन्दी निरुक्त । ७१ भाष्यानुवादः । यह वह शब्द करता है जिससे गो प्रवृत्त हुई हुई मिमाती है । या मायु = शब्दको करतो है । अथवा मायु नाम आदित्यके समान [ अपनेको बनाती है । ] यह वाक् देवता मध्यम लोककी है । ध्वं- सन या, मेघमें टिकी हुई । वह चित्तिरों या चटचटा शब्दोंसे विद्युत् होती हुई मनुष्यको झुका देती है । "वव्रि" को लौटाती है । "वव्रि" यह रूपका नाम है । 'वृणोति' ढांप लेता है, इस कर्त्तृवाच्य क्रियासे है। वृष्टिसे पृथिवीको ढांपकर उसे फिर ले लेती है ॥ ५ ॥ व्याख्या । शाकपूर्णि आचार्यको उभयलिङ्गा देवताने, देवतातत्वके जान- नेके लिये जो ऋचा दी थी, वह यह "अयं स शिङ्क्ते" ऋचा है । यह ऋचा एक ही वाक्यमें अपने एक ही स्तवनीय। देवताको, "अयम्, सः" इन पुँल्लिङ्ग पदोंसे पुरुष रूपमे, और "गौः, अभीवृत्ता" इत्यादि स्त्रीलिङ्गरूपदोंसे स्त्रीके रूपमें कह रही है । तथा उस एक ही देव- ताको मध्यमलोकके देवताके वर्षकर्मसे और उत्तमलोकके देवताके रसादान ( जलका खींच लेना ) कर्मसे स्तुति करती है । इससे नहीं जाना जाता, क्या यह पुरुष देवता है ? या स्त्री देवता है ? तथा यह मध्यमलोककी देवता है ? या उत्तम लोककी ? किन्तु विरुद्ध वाक्यों या धर्मोंकी एक वाक्यता करनेसे यह फलित निकल आता है कि,-वही एक देवता मेघरूपसे पुरुष और वाक्रूपसे स्त्री है । एवम् विद्युद्-रूपसे मध्यम स्थाना और आदित्यरूपसे उत्तम- स्थाना है । अर्थात्-वही एक वाग् देवता मेघमें शब्द सहित विद्युद्रूपसे स्थित होकर वर्षकर्मसे पृथिवीको आच्छादन करती है । सुतराम्, देवताका कोई नियत रूप नहीं है, वह महाभाग होती
७२ २ अ० २ पा० ५ खं० । है, उसको इच्छानुसार सब प्रकारके रूप धारण करनेका सामर्थ्य है, अतः उसके विरुद्धरूपों तथा कर्मोंमें सन्देहाकुल नहीं होना चाहिये । यही देवता-तत्त्वका रहस्य उभय लिङ्ग देवताने शाक- पूणि आचार्यको इस ऋचाके द्वारा समझाया है, और इसी प्रकार अन्यत्र अन्यत्र भी देवतातत्त्वके सन्देहको दूर करना चाहिये । यह मत किसी मनुष्यका नहीं, किसी ऋषिका नहीं, और न किसी अन्यका है। किन्तु, मन्त्र या वेद ऐसा कह रहा है, यह भी देव- ताकी कृपासे उसके द्वारा ऋषिको मिला है, और एक दूसरे ऋषिने ही उसका भाष्य किया है । अब वेद वेदाङ्गोंके माननेवाले उन मित्रोंको यहाँ ध्यानसे देखना चाहिये । जो देवताओंके अवतार और उनकी ऐसी कृपाओंमें सन्देह रखते हैं। पहिले ( २, २, ३-४ ) 'निऋ'ति' शब्द पर एक वाच्य-सन्देह- का उपदर्शन कराया है, कि—"निऋ'तिमाविवेश" यहाँ पर निऋ'ति पृथिवी है, या पाप्मा, और निर्णय किया है कि-परि- व्राजकोंके मतसे यह पाप्मा या दुःख हो सकता है, और नैरुक्तोंके मतसे पृथिवी । उसी प्रकार यह देवता-सन्देहका उदाहरण दिया है । अर्थात् जिस प्रकार मन्त्रोंमें वाच्य-सन्देह होता है, उसी प्रकार देवत.-सन्देह भी हो सकता है, यही सन्देह-सामान्य रूप पूर्व प्रकरणके साथ इस प्रकरणकी संगति है। अब शब्दोंके अनुक्रमणका अधिकार है, इसमें एक 'गो' शब्दका निर्वचन हो चुका है, उसमें निर्वचनके धर्म सब दिखाये गये, उसीके सादृश्य पर और शब्दोंका नवचन ऊहा पूर्वक कर लेना चाहिये । जैसे—'ग्मा' क्योंकि-'दूरं गता भवति' वह दूर गई हुई होती है, या “अस्यां गच्छन्ति भूतानि” इसमें प्राणी गमन करते हैं । 'ज्मा' “जमन्ति गच्छन्ति अस्यां भूतानि” इसमें भूत गमन करते हैं,— इत्यादि ।
हिन्दी निरुक्त । ७३ नैघण्टुकास्तु ये शब्दाः प्रत्यर्थं गणसंस्थिताः । छन्दोभ्योऽन्विष्यतत्वार्थान् निर्ब्रूयात् योग- तस्तुतान् ॥ अर्थः-पृथक् पृथक् अर्थवाले गणोंमें जो नैघण्टुक शब्द हैं, उनको छन्दों या मन्त्रोंसे तत्वार्थ-सहित अन्वेषणा करके शास्त्रके नियमोंके अनुसार निर्वचन करे ॥ ५ ॥ इति हिन्दी निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयंपादः ।
७४ २ अ० ३ पा० १ खं० । : अथ तृतीयः पादः । [ निघण्टुः ] हेम ( १ ) । चन्द्रम् ( २ ) । रुक्मम् ( ३ ) । अयः ( ४ ) । हिरण्यम् ( ५ ) । पेशः ( ६ ) । कृशनम् ( ७ ) । लोहम् ( ८ ) । कनकम् ( ९ ) । काञ्चनम् ( १० ) । भर्म ( ११ ) । अमृतम् ( १२ ) । मरुत् ( १३ ) । दवम् ( १४ ) । जातरूपम् ( १५ ) । इति पञ्चदश हिरण्य नामानि ॥ २ ॥ अम्बरम् ( १ ) । वियत् ( २ ) । व्योम ( ३ ) । बर्हिः ( ४ ) । धन्व ( ५ ) । अन्तरिक्षम् ( ६ ) । आ- काशम् ( ७ ) । आपः ( ८ ) । पृथिवी ( ९ ) । भूः ( १० ) । स्वयम्भू ( ११ ) । अध्वा ( १२ ) । पुष्क- रम् ( १३ ) । सगरः ( १४ ) । समुद्रः ( १५ ) । अध्वरम् ( १६ ) । इति षोडश अन्तरिक्ष नामानि ॥ ३ ॥ [ खण्ड १ ] नि०-हिरण्य नामानि उत्तराणि पञ्चदश । हि- रण्यं कस्माद् ? ह्रियते आयम्यमानम्-इति वा । ह्रियते जनाद्-जनम्-इति वा । हितरमणं भवति-
- इति वा । हर्यतेर्वांस्यात् प्रेप्साकर्मणः ।
हिन्दी निरुक्त । ७५ अन्तरिक्ष नामानि उत्तराणि षोडश । अन्त- रिक्षं कस्माद् ? अन्तराक्षान्तं भवति । अन्तरा इमे इति वा । शरीरेषु-अन्तः-अक्षयम्-इति वा । तत्र समुद्र इत्येतत् पार्थिवेन समुद्रेण सन्दिह्यते । स- मुद्रः कस्मात् ? समुद्रवन्ति अस्माद्-आपः । सम- भिद्रवन्ति-एनम्-आपः । सम्मोदन्ते अस्मिन् भू- तानि । समुद्रको भवति । समुनत्ति-इति वा । तयोर्विभागस्तत्र-इतिहास मा चक्षते ।-देवापि ऋचार्ष्टिषेणः शन्तनुश्च कौरव्यौ भ्रातरौ बभूवतुः । सश्रन्तनुः कनीयान्-अभिषेच याञ्चक्रे । देवापिः- तपः प्रतिपेदे । ततः शन्तनो राज्ये द्वादश वर्षाणि देवो न ववर्ष । तम् ऊचु ब्राह्मणाः-‘अधर्मः त्वया चरितः’-‘जेष्ठं भ्रातरम्-अन्तरित्य-अभिषेचितम्’, त- स्मात् ते देवो न वर्षति’-इति । स शन्तनुर्देवापिं शिशिक्ष राज्येन । तम् उवाच देवापिः ‘पुरोहितः ते आसानि’ ‘याजयाति च त्वा’ इति । तस्य-एतद् वर्ष काम सूक्तं, तस्य-एषा भवति ॥ १ ॥ अनुवाद । प्रकृत पृथिवीके नामोंके अनन्तर पन्द्रह (१५) सुवर्णके नाम हैं । ‘हिरण्य’ क्यों-[ कहलाता है ? ] [ शिल्पी इसे कड़े-कुण्डल-
कण्ठे और बाजू आदि भूषणों के रूपमें] विस्तृत करनेके लिये हरण करते हैं। अथवा एक मनुष्यसे दूसरे मनुष्यके प्रति हरण किया जाता है। [क्योंकि-इससे व्यवहार होता है, इससे एक स्थानमें यह स्थित नहीं होता, किन्तु, सदा हरण ही किया जाता है।] अथवा हित और रमण होता है। क्योंकि-वह जिसके पास होता है, उसका दुर्भिक्ष आदिके समय हित होता है। तथा उसे लेकर चूहेको भी रति होती है, फिर मनुष्यको हो, इसमें कहना ही क्या है ? ] अथवा प्रेप्सा या प्रकृष्ट प्राप्त करनेकी इच्छा अर्थमें 'हृञ्' (भ्वा० उ०) धातुसे है। [क्योंकि-सभी इसे हरण या बहुत ही प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं।] सुवर्णके नामोंके अनन्तर सोलह (१६) अन्तरिक्ष या आकाशके नाम हैं। 'अन्तरिक्ष' क्यों बोला जाता है ? द्युलोक और भूलोक- के मध्यमें स्थित और पृथिवीके अन्त तक क्षान्त या फैला हुआ है। अथवा इन दोनों लोकोंके बीचमें निवास करता है। अथवा शरीरोंमें यही अक्षय-रूपसे भीतर रहता है, और पृथिवी आदि भूत क्षीण हो जाते हैं, इसी अक्षयत्व-रूप, धर्मसे यह 'अन्तरिक्ष' है। उन सोलह नामोंमें 'समुद्र' यह एक नाम पार्थिव या प्रसिद्ध समुद्र रूप अर्थसे मन्त्रोंमें सन्दिग्ध होता है। [क्योंकि-अन्तरिक्ष- के समान वह भी इस शब्दका दूसरा अर्थ है।] [जलाशय-पक्षमें ] क्योंकि-इससे लहरी तरङ्ग आदि रूपसे जल बहते हैं। इसमें भूत या जल-जन्तु संमोदन या बहु हर्ष करते हैं। [क्योंकि-यह अमोघ जल है।] अथवा उद्र या उदक इसमें संहत [इकट्ठा] है, इससे यह समुद्र है। अथवा यह सब जगत्को अपनेमेसे निकले हुए जलोंसे संक्लेदन या गीला करता है। उन दोनों अर्थोंका विभाग है। उसके उदाहरण मन्त्रके अर्थमें [आचार्य] इतिहास कहते हैं।—कुरुवंशमें ऋष्टिषेणके पुत्र देवापि
हिन्दी निरुक्त । ७७ और शन्तनु दो भाई थे । उन दोनोंमें छोटा जो शन्तनु था, उसने अपना अभिषेक कर लिया, और अभिषिक्त होकर राजा हो गया । दूसरा-जेष्ठ, देवापि तप करने चला गया । फिर शन्तनुके राज्यमें बारह वर्ष तक इन्द्र देवने वर्षा नहीं की । उसे ब्राह्मण बोले-तैने अधर्म किया, कि-जेष्ठको बीचमें छोड़ कर अपना अभिषेक कर लिया, इसी कारणसे-तेरे राज्यमें-देव नहीं बरसता है । उस शन्तनुने देवापिसे प्रार्थना की ; कि-यह राज्य प्रस्तुत है । देवापि उसे बोला कि-मै तेरा पुरोहित हो जाऊँ, और तुझे यज्ञ कराऊं । उस देवापिको इस वर्ष काम-सूक्तका आविर्भाव हुआ था । उस 'समुद्र' शब्दके जो जल-निधिके साथ सन्दिग्ध हैं, प्रविभागके दिखानेके लिये यह ऋचा निर्वचन करनेवाली है ॥ १ ॥ व्याख्या । इस खण्डमें पन्द्रह हिरण्य नामों और सोलह अन्तरिक्ष नामोंकी व्याख्या या भाष्य है । प्रायः सभी खण्डोंमें जो 'पञ्चदश' 'षोडश' आदि संख्या दी गई हैं, वह निघण्टु ग्रन्थमें पठित शब्दोंकी संख्या- का अनुवादमात्र है, किन्तु वह अन्य शब्दोंके निषेधके लिये नहीं। इससे असाम्नात या अपठित पर्याय शब्द भी तहाँ तहाँ व्याख्येय समझने चाहिये । जैसे कि-प्रथम खण्डमें 'हाटक' 'सुवर्ण' 'चामीकर' और शात कुम्भ आदि, और दूसरेमें दिव् 'द्यो' विहा- यस्,-आदि । पृथिवीमें ही सुवर्ण होता है, इस कारण पृथिवी नामोंके अन- न्तर 'हिरण्य' नाम कहे गये हैं । आद्य-खण्डमें एक 'हिरण्य' शब्दका ही निर्वचन किया है। उसमें दिखाया कि,एक ही हरण-क्रिया द्विविध सम्बन्धसे 'हिरण्य' शब्दको बनाती है, या उसे स्वर्ण-द्रव्यमें ले जासकती है। जैसे- [ १ ] शिल्पी भी कटक, कुण्डल आदि भूषणोंके बनानेको उसे
[७८] [२ अ० ३ पा० २ ख० ।]
हरण करते हैं। [२] अन्य अन्य मनुष्य, व्यवहारके लिये एकसे दूसरेके पास हरण करते हैं। तथा—'हित+रमण' और इच्छा- र्थक 'हर्य' [ भ्वा० प० ] धातुसे अर्थ और शब्दके सादृश्यसे 'हिर- ण्य'-शब्द बनाया है। इस शब्दके ढङ्ग पर ही अन्य 'हेम' 'चन्द्र' आदिकी व्याख्या करना चाहिये । जैसे—'हितं मम इदम्,' अर्थात् 'यह मेरा हित है,' ऐसा सभी पुरुष मानते हैं। इनसे 'हित+मम' इन दो पदोंके विकारसे 'हेम' पद बना । एवम् 'चदि' कान्तौ [ भ्वा० प० ] धातुसे 'चन्द्र' शब्द है। क्योंकि—'चन्दति इद सर्वः', अर्थात् इसे सब चाहते हैं,—इससे यह चन्द्र है । अन्तरिक्ष नामोंमें 'अन्तरिक्ष' और समुद्र' दो नामोंकी व्याख्या है। 'समुद्र' शब्दके दो अर्थ हैं, एक आकाश, और दूसरा समुद्र, इस निरुक्त-शास्त्रमें मन्त्रोंमें जिसके दो या अनेक अर्थ होते हैं, या हो सकते हैं, वह—सन्दिग्ध-पद बोला जाता है, यह इस शास्त्रकी शैली है । अन्तरिक्ष नामकी बनावट 'अन्तरा+क्षान्तम्' = 'अन्तरिक्षम्'— इस प्रकार, अन्तरा और क्षान्त इन दो पदोंसे मिलती है, और अर्थ भी उसके अर्थ-तत्त्वमें घट जाता है। ऐसे ही केवल 'अन्तरा' शब्द और 'अन्तर+अक्षय' इन दो शब्दोंसे भी निरुक्त होता है। 'अम्बर'—शब्द । 'अम्बुमत्-भवति, इति अम्बरम् । अर्थात्— अम्बु या जलवाला होता है, इस कारण 'अम्बर' है। 'वियत्'—शब्द । 'नाना भावेन सर्व तो वियतम्' इति वियत् । अनेक रूपसे सब ओर फैला हुआ है, इससे 'वियत्' है। 'व्योम'—शब्द । नाना भावेन एतद् अवति भूतानि,—इति व्योम । नाना प्रकारसे अवकाश दानसे यह भूतोंकी रक्षा करता है, इससे व्योम है। इसी प्रकार अन्य शब्दोंमें ऊहा करना ।
हिन्दी निरुक्त । ७६ आगे जो वर्षकाम—सूक्तकी ऋचा दी जाती है,—उसमें सन्दि- ग्ध ‘समुद्र’ पदके दोनों अर्थ मन्त्रार्थके सामर्थ्यसे ही स्पष्ट प्रतीत होते हैं ॥ १ ॥ [ खं० २ ] आर्ष्टिषेणोहोत्रमृषिर्निषीदन्देवापिर्देव सुमतिं चिकित्वा॒न् । उत्तरस्मा दधरं समुद्रमपो दि॑व्या अस्रजद्वर्ष्या अभि ॥” [ भा० ] “आर्ष्टिषेणः” ऋष्टिषेणस्य पुत्रः । इषितः षेणस्य इति वा । ‘सेना’ सेश्वरा । समान गतिर्वा । ‘पुत्र.’ पुरुत्रायते । निपरणाद् वा । ‘पु’ नरकं, ततः त्रायते इति वा । “होत्रम्—ऋषिः-निषीदन्” ।। ‘ऋषिः’ दर्श- नात् । ‘स्तोमान् ददर्श’-इति-औपमन्यवः । “तद्-यद्-एनान्—तपस्या मानान् ब्रह्म- स्वयम्भु—अभ्यानर्षत्, तद् ऋषीणाम्— ऋषित्वम्”—इति विज्ञायते । “देवापिः” देवानाम्-आप्त्या, स्तुत्याच प्रदानेन च । “देव सुमतिम्” देवानां कल्याणीं मतिम् । “चिकित्वा॒न्” चेतनावान् । “स उत्तर- स्माद्-अधरं समुद्रम्” । ‘उत्तरः’ उद्भूततरो