भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 231

६४ २ अ० २ पा० ४ खं० । निर्मोयन्ते अस्मिन् भूतानि । योनिः-अन्त रिक्षम् महानवयवः । “परिवोतः” वायुना । अयमपि इतरो योनिः,-एतस्माद्-एव । परिवृतो भवति । “बहु प्रजाः” भूमिम्- आपद्यते वर्ष कर्मणा । शाकपूणिः संकल्पयां चक्रे-'सर्वा देवता जाना- मि'-इति । तस्मै देवता उभयलिङ्गा प्रादुबर्भूव । तां न जज्ञे । तां प्रपच्छ 'विविद् घाणित्वा'-इति । सा अस्मै —'एतात् ऋचम् आदि देश एषा मद्दैवता'— इति ॥ ४ ॥ “यईं चकार”-इति । दीर्घतमसः आर्षम् । त्रिष्टुप् । महाव्रते वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।” अनुवाद । मन्त्रार्थ-‘निऋॄंति’ शब्दकी दुःख वाचकताके पक्षमें-जो मनुष्य गर्भको करने वाला है, वह इसके तत्त्वको नहीं जानता, बल्कि-वह जो इस गर्भ या जन्तुको पेटके या शरीरके भीतर अध्यात्म-बुद्धिके द्वारा देखता है, यथार्थ रूपसे जानता है। वह गर्भका उत्पन्न करने वाला पुरुष माताको योनि या गर्भ स्थानमें माताके खाये, पीये, चक्खे और चबाये हुए अन्नादिके परिणामसे पुष्ट होता है, तथा समय पर जरायु (जेर) से लिपटा हुआ जन्मता है । अनन्तर, इसी प्रकार, अनेक बार जन्म लेता हुआ, दुःखको प्राप्त होता है । अर्थात् यह गर्भतत्त्वके न जानने वालोंकी गति है । इस व्याख्यामें गर्भ कर्त्ताके लिये ‘निऋॄंति’ को प्राप्तिही फल दिखाया है, और वह दुःखही होसकता है, इस रीतिसे यह व्याख्यान ‘निऋॄंति’ शब्दके