भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 232

हिन्दी निरुक्त । ३९ दुःखार्थक 'ऋच्छ' धातुसे निर्वचन करनेमें नियम या सहायक होता है । और—'निऋ'ति' शब्दको भूमि वाचकता पक्षमें-जो पुरुष इस वृष्टिका करनेवाला या फेंकने वाला मेघ है'-जानता है; वह इसके तत्वको नहीं जानता । बल्कि-वह, जो आदित्यकी रश्मियोंके भी- तर छिपी हुई वृष्टिको देखता है, जानता है । वह मेघ, माता या अन्तरिक्षके योनि = एक देशमें वायुसे घिरा हुआ, वर्षा कालमें बहुरूपसे उत्पन्न होता हुआ भूमिमें आता है। इस व्याख्यामें मेघ 'निऋ'ति' को आता है, और वह भूमिही, होसकती है, इस लिये उसीके अनुसार 'निऋ'ति' शब्दका निर्वचनभी 'निरमण' क्रियासेही होना उचित है । यही "यथार्थं निर्वक्तव्यानि" [ नि०-अ० २, पा० २, खं० ३ ] इस वचनका तात्पर्य है। [भाष्यार्थ-] [प्रथम अर्थके पक्षपाती-] 'बहुत सन्तानोंका उत्पन्न करने वाला' दुःखको प्राप्त होता है, ऐसा सन्यासी मानते हैं। [प्रयोजन-उन्हींकी दृष्टिसे इस मन्त्रमें ऐसा अर्थ दिखाई देता है ] [ दूसरा पक्ष-] 'इस मन्त्रमें वर्ष कर्म या वृष्टिका वर्णन है' यह निरुक्त शास्त्रके पण्डित मानते हैं । [इनके मतमे'] 'बई' चकार" यहां वर्ष कर्मके साथ 'चकार' पदमें 'डुकृञ्' करणे ( तना० उ० ) धातु और 'कृ' विक्षेपे ( तु० प० ) धातुका सन्देह है। [क्योंकि, यह रूप दोनोंसे समानही बनता है, और दोनोंके अर्थ भी संगत होजाते हैं । जैसेकि, वर्षाको करता है, या, फेंकता है । ] वह इसको नहीं जानता, जो देखता है,-'मध्यम या मेघ है'। जो देखता है-'आदित्यमें छिपे हुएको, [वह जानता है। "मातुर्योनौ"-माताकी योनिमें । 'मातः' नाम अन्तरिक्ष । [क्योंकि-] इसमें भूत ( प्राणी ) निर्माण किये जाते हैं। 'योनि' नाम अन्तरिक्ष या उसके छोटे भागका है । वह बड़ा और अनव-