निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयव या भाग रहित है । घिरा हुआ—वायुसे । यह भी दूसरा स्त्रीका योनि, इसी व्याख्यासे है । [ क्योंकि-वहभी जोरसे लिपटा हुआ होता है। बहुत प्रकारसे होता हुआ भूमिको प्राप्त होता है – यह वर्ष कर्मसे [ व्याख्या है । ] निर्वचनके सम्बन्धमें सन्देहस्थलका एक वैदिक इतिहास । शाकपूणि आचार्यने सङ्कल्प किया कि—'मैं सब देवताओंको जानता हूँ' । उसके सामने एक, दो प्रकारके चिन्हवाली देवता, जिसमें स्त्री और पुरुष दोनोंके चिन्ह थे, अथवा मध्यम लोकके देवता और द्युलोकके देवताके चिन्ह थे, प्रकट हुई । उसको उसने, न जाना । उसको पूछा कि-'मैं तुझे जानना चाहता हूँ'। उसने इसे यह ऋचा दी और कहा कि—"यह ऋचा 'मद्देवता' है, अर्थात् इस ऋचाकी मैं देवता हूं, तू इसके द्वारा मुझे जान सकेगा।' क्योंकि,—तू नैरुक्त है ॥ ४ ॥ व्याख्या— भाष्यकारने “य ईं चकार” इस ऋचाके चौथे पादकी व्याख्या दोनों मतोंके अनुसार इस मन्त्रके भाष्यके आदि और अन्तमें दिखाई है–"बहुप्रजाः कृछ्रमापद्यते इति परिव्राजकाः” “बहुप्रजा भूमि मा पद्यते, वर्ष कर्मणा”। और जो बीचमें भाष्य है, वह शेष तीन पादोंका है, और वह वर्षकर्म या नैरुक्त मतके अनुसार है । भाष्य अन्वयानुसार नहीं है, किन्तु फुटकर पदोंका है, भाष्य देखते समय मन्त्र पर दृष्टि रखनी चाहिये, ऐसे ही भाष्यसे सहायता मिल सकती है । परिव्राजक पक्षमें 'माता' नाम जननी, और 'योनि' नाम स्त्री- योनिका है। नैरुक्त मतमें 'माता' नाम अन्तरिक्ष, और 'योनि' नाम उसके एक देश ( एक भाग) अन्तरिक्षका है। मन्त्रमें दोनों ही पक्षोंमें 'चकार' क्रियाके साथ 'गर्भम्' या 'वर्षम्' कर्म अध्या-