भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 234

[Header] हिन्दी निरुक्त । ६७ हारसे लिया जाता है। 'तस्मात्' पद 'तस्य' (उसका) पदका अर्थ देता है, और 'हिरुक्' अभ्यन्तरका । "नसो अस्य वेद, मध्यमः" इसको 'सः अस्य न वेद, यः मध्यमो वर्षस्यकर्त्ता, इति वेद' 'वह इसको नहीं जानता, जो समझता है,- इस वर्षका करनेवाला मध्यम या मेघ है' ऐसा अन्वय कल्पित करके समझना चाहिये । इसी प्रकार "स एव अस्य वेद, मध्यमः" कोऽर्थः—सएव अस्य तत्वं जानाति, अय मध्यम इति, "यः आदित्योपहितम्, ददर्श" पश्यतीत्यर्थः । 'वही पुरुष इसके तत्वको जानता है, कि 'यह मध्यम है', जो आदित्य या उसकी रश्मियोंके भीतर उसे देखता है' ऐसे अन्वयकी योजनासे देखना होगा । अविद्यमानाः अवयवाः यस्य सः अनवयवः, महांश्चासौ अन- वयवः, महानवयवः । जिसके अवयव या खण्ड न हों, उसे अन- वयव कहते है, और महान् अनवयवको 'महानवयव' । यह दोनों विशेषण अन्तरिक्ष या आकाशके हैं। बड़ा इससे है कि-इसमें संसार समाया हुआ है, और अनवयव इससे है कि, इसमें घट, पट, शरीर आदि पदार्थोंके समान जोड़ नहीं है। कहींसे भी इसके दो भाग नहीं हो सकते। भाष्यमें 'योनिः' पदके साथ इसका सम्बन्ध है। "बहु प्रजाः ।" मेघ पक्षमें 'बहु यथास्यात् तथा प्रजायते'- इति 'बहु प्रजाः' । बहु जैसे हो, वैसे होनेवाला । जब होता है, सब पृथिवी और जलाशयोंमें सर्वत्र जल ही जल व्याप्त हो जाता है । गर्भपक्षमें—'बहवः प्रजाः यस्य, सः बहुप्रजाः' बहुत हैं, प्रजा या अपत्य जिसके, वह बहुसन्तान पुरुष 'बहुप्रजाः' है। भगवद्दुर्गाचार्यने छात्रोको मर्मज्ञ बनानेके लिये इसी ऋचाके