निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ २ अ० २ पा० ४ खं० । जोड़कर एक और मन्त्र दिखाया है, और उस पर बहुत अच्छी टिप्पणी की है, हम उसे नीचे दिखा देते हैं:— आप कहते हैं कि—'इस प्रकार इस मन्त्रमें नैरुक्तोंके मतमें ‘निर्ऋति’ शब्दसे भूमि और परिव्राजकोंके मतमें कृच्छ्रापत्ति कही जाती है, सो इसी प्रकारसे मन्त्रोंमें शब्दकी गतिके वैभवसे दोनों ही अर्थ घट जाते हैं, वैसे ही “दधि क्राणों अकारिषम्” [ ऋ० सं०-३, ७, १३, ६ ] यह मन्त्र है । इसके तीन स्थानोंमें विनियोग है,—( १ ) अग्निहोत्रमें अग्निके उपस्थानमें, ( २ ) अग्निष्टोममें दधिके भक्षणमें, और-( ३ ) अश्वमेधमें अश्वके समीपमें महिषी ( यज- मान-पत्नी ) के खड़े हो जाने पर अन्य पत्नियोंके जप करनेमें । वहां प्रत्येक विनियोगके साथमें इसका अन्य अन्य अर्थ ही होना चाहिये । क्योंकि-कर्ममें मन्त्रका अपने अर्थके द्वारा उसका स्मरण करना ही प्रयोजन है । और इसीसे ये मन्त्र वक्ताके अभिप्रायके अनुसार अन्यत्व या भिन्नताको धारण करते हैं, इनमें अर्थकी इयत्ता या परिमाण नहीं है, क्योंकि-ये महार्थ या अमोघ अथवा अपरिमित अर्थ वाले होते हैं । तथा दुष्परिज्ञान या बड़ी कठि- नाईसे जाने जा सकते हैं, जिस प्रकार घोड़ा सवारकी विशेषतासे अच्छा और बहुत अच्छा चलता है, वैसे ही ये मन्त्र वक्ताके प्रकर्षसे साधु और साधुतर अर्थोंको भरते हैं । इससे अध्ययन करनेवालोंको यह सार लेना चाहिये कि-इस शास्त्रमें एक शब्दका जो निर्वचन किया जाता है, वह लक्षण मात्र अथवा नाम मात्र है । कहीं कहीं अध्यात्म, अधिदैव और अधि- यज्ञ अर्थके दिखानेके लिये व्याख्या है । किन्तु जितने अर्थ अध्यात्म, अधिदैव और अधियज्ञमें घटनेवाले युक्तिसे सिद्ध हों, वे सभी योजनीय हैं, इसमें कोई अपराध नहीं है । यास्क रने जो कुछ चमत्कार इस ग्रन्थमें रखा है, उसे हम देख नहीं सकते, अथवा जितना ध्यान देंगे, उतना ही देख सकेंगे ।