निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसके अनुसार हम देखते हैं कि—उपर्युक्त उदाहरणोंसे निर्वचनके विशालरूपको सन्मुख खड़ा करनेमें कोई त्रुटि नहीं रखी गई है, तथापि, पामर, मन्द—बुद्धि लोग कह सकते हैं कि, ऋषि ने जैसा अर्थ परिव्राजक और नैरुक्तोंके मतभेदसे दिखाया है, यह सब आधु- निक लौकिक कल्पना है, ऐसा वेदमें सम्भव नहीं, उस आपत्तिको समूल नष्ट करनेके लिये एक वैदिक इतिहास दिखाकर इस प्रसङ्गके साथ पादको समाप्त कर देते हैं। शाकपूणि ऋषिका जो सङ्कल्प हुआ, और उनके उस अहङ्कारको दूर करनेके लिये देवताने प्रादुर्भूत होकर जो ऋचाके द्वारा उत्तर दिया है, वह मार्मिक पुरुषोंको मनोगत करने योग्य है। जब ऋचा हीसे देवताने उत्तर दिया और वह शाकपूणिके देवता-परिज्ञानको अल्प ठहरानेके लिये ही है तो, इससे स्पष्ट ही प्रतीत होता है, कि,- वेदको अपना अर्थ अमोघ तथा अपरिमित अभीष्ट है ॥ ४ ॥ । (खण्ड ५) “अयं स शिङ्क्ते येन गौरभी वृत्ता मिमाति मायुध्वंसनावधिश्रिता । साचित्तिभिर्नियि चकार- मर्त्यं विद्युद् भवन्ती प्रति वव्रिमौहत” ॥ [ भाष्यम्-] अयं स शब्दायते, येनगौः-अभिपवृत्ता मिमाति मायुं शब्दं करोति, मायुमिव-आदित्यम्,- इति वा । वाग्-एषा माध्यमिका । ध्वंसने मेघे अधिश्रिता । सा चित्तिभिर्निरकरोतिमर्त्यं विद्युद् भवन्ती । प्रत्यूहते—वव्रिम् । "वव्रिः"—इति-