भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

कण्ठे और बाजू आदि भूषणों के रूपमें] विस्तृत करनेके लिये हरण करते हैं। अथवा एक मनुष्यसे दूसरे मनुष्यके प्रति हरण किया जाता है। [क्योंकि-इससे व्यवहार होता है, इससे एक स्थानमें यह स्थित नहीं होता, किन्तु, सदा हरण ही किया जाता है।] अथवा हित और रमण होता है। क्योंकि-वह जिसके पास होता है, उसका दुर्भिक्ष आदिके समय हित होता है। तथा उसे लेकर चूहेको भी रति होती है, फिर मनुष्यको हो, इसमें कहना ही क्या है ? ] अथवा प्रेप्सा या प्रकृष्ट प्राप्त करनेकी इच्छा अर्थमें 'हृञ्' (भ्वा० उ०) धातुसे है। [क्योंकि-सभी इसे हरण या बहुत ही प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं।] सुवर्णके नामोंके अनन्तर सोलह (१६) अन्तरिक्ष या आकाशके नाम हैं। 'अन्तरिक्ष' क्यों बोला जाता है ? द्युलोक और भूलोक- के मध्यमें स्थित और पृथिवीके अन्त तक क्षान्त या फैला हुआ है। अथवा इन दोनों लोकोंके बीचमें निवास करता है। अथवा शरीरोंमें यही अक्षय-रूपसे भीतर रहता है, और पृथिवी आदि भूत क्षीण हो जाते हैं, इसी अक्षयत्व-रूप, धर्मसे यह 'अन्तरिक्ष' है। उन सोलह नामोंमें 'समुद्र' यह एक नाम पार्थिव या प्रसिद्ध समुद्र रूप अर्थसे मन्त्रोंमें सन्दिग्ध होता है। [क्योंकि-अन्तरिक्ष- के समान वह भी इस शब्दका दूसरा अर्थ है।] [जलाशय-पक्षमें ] क्योंकि-इससे लहरी तरङ्ग आदि रूपसे जल बहते हैं। इसमें भूत या जल-जन्तु संमोदन या बहु हर्ष करते हैं। [क्योंकि-यह अमोघ जल है।] अथवा उद्र या उदक इसमें संहत [इकट्ठा] है, इससे यह समुद्र है। अथवा यह सब जगत्‌को अपनेमेसे निकले हुए जलोंसे संक्लेदन या गीला करता है। उन दोनों अर्थोंका विभाग है। उसके उदाहरण मन्त्रके अर्थमें [आचार्य] इतिहास कहते हैं।—कुरुवंशमें ऋष्टिषेणके पुत्र देवापि