निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ७७ और शन्तनु दो भाई थे । उन दोनोंमें छोटा जो शन्तनु था, उसने अपना अभिषेक कर लिया, और अभिषिक्त होकर राजा हो गया । दूसरा-जेष्ठ, देवापि तप करने चला गया । फिर शन्तनुके राज्यमें बारह वर्ष तक इन्द्र देवने वर्षा नहीं की । उसे ब्राह्मण बोले-तैने अधर्म किया, कि-जेष्ठको बीचमें छोड़ कर अपना अभिषेक कर लिया, इसी कारणसे-तेरे राज्यमें-देव नहीं बरसता है । उस शन्तनुने देवापिसे प्रार्थना की ; कि-यह राज्य प्रस्तुत है । देवापि उसे बोला कि-मै तेरा पुरोहित हो जाऊँ, और तुझे यज्ञ कराऊं । उस देवापिको इस वर्ष काम-सूक्तका आविर्भाव हुआ था । उस 'समुद्र' शब्दके जो जल-निधिके साथ सन्दिग्ध हैं, प्रविभागके दिखानेके लिये यह ऋचा निर्वचन करनेवाली है ॥ १ ॥ व्याख्या । इस खण्डमें पन्द्रह हिरण्य नामों और सोलह अन्तरिक्ष नामोंकी व्याख्या या भाष्य है । प्रायः सभी खण्डोंमें जो 'पञ्चदश' 'षोडश' आदि संख्या दी गई हैं, वह निघण्टु ग्रन्थमें पठित शब्दोंकी संख्या- का अनुवादमात्र है, किन्तु वह अन्य शब्दोंके निषेधके लिये नहीं। इससे असाम्नात या अपठित पर्याय शब्द भी तहाँ तहाँ व्याख्येय समझने चाहिये । जैसे कि-प्रथम खण्डमें 'हाटक' 'सुवर्ण' 'चामीकर' और शात कुम्भ आदि, और दूसरेमें दिव् 'द्यो' विहा- यस्,-आदि । पृथिवीमें ही सुवर्ण होता है, इस कारण पृथिवी नामोंके अन- न्तर 'हिरण्य' नाम कहे गये हैं । आद्य-खण्डमें एक 'हिरण्य' शब्दका ही निर्वचन किया है। उसमें दिखाया कि,एक ही हरण-क्रिया द्विविध सम्बन्धसे 'हिरण्य' शब्दको बनाती है, या उसे स्वर्ण-द्रव्यमें ले जासकती है। जैसे- [ १ ] शिल्पी भी कटक, कुण्डल आदि भूषणोंके बनानेको उसे