भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

[७८] [२ अ० ३ पा० २ ख० ।]

हरण करते हैं। [२] अन्य अन्य मनुष्य, व्यवहारके लिये एकसे दूसरेके पास हरण करते हैं। तथा—'हित+रमण' और इच्छा- र्थक 'हर्य' [ भ्वा० प० ] धातुसे अर्थ और शब्दके सादृश्यसे 'हिर- ण्य'-शब्द बनाया है। इस शब्दके ढङ्ग पर ही अन्य 'हेम' 'चन्द्र' आदिकी व्याख्या करना चाहिये । जैसे—'हितं मम इदम्,' अर्थात् 'यह मेरा हित है,' ऐसा सभी पुरुष मानते हैं। इनसे 'हित+मम' इन दो पदोंके विकारसे 'हेम' पद बना । एवम् 'चदि' कान्तौ [ भ्वा० प० ] धातुसे 'चन्द्र' शब्द है। क्योंकि—'चन्दति इद सर्वः', अर्थात् इसे सब चाहते हैं,—इससे यह चन्द्र है । अन्तरिक्ष नामोंमें 'अन्तरिक्ष' और समुद्र' दो नामोंकी व्याख्या है। 'समुद्र' शब्दके दो अर्थ हैं, एक आकाश, और दूसरा समुद्र, इस निरुक्त-शास्त्रमें मन्त्रोंमें जिसके दो या अनेक अर्थ होते हैं, या हो सकते हैं, वह—सन्दिग्ध-पद बोला जाता है, यह इस शास्त्रकी शैली है । अन्तरिक्ष नामकी बनावट 'अन्तरा+क्षान्तम्' = 'अन्तरिक्षम्'— इस प्रकार, अन्तरा और क्षान्त इन दो पदोंसे मिलती है, और अर्थ भी उसके अर्थ-तत्त्वमें घट जाता है। ऐसे ही केवल 'अन्तरा' शब्द और 'अन्तर+अक्षय' इन दो शब्दोंसे भी निरुक्त होता है। 'अम्बर'—शब्द । 'अम्बुमत्-भवति, इति अम्बरम् । अर्थात्— अम्बु या जलवाला होता है, इस कारण 'अम्बर' है। 'वियत्'—शब्द । 'नाना भावेन सर्व तो वियतम्' इति वियत् । अनेक रूपसे सब ओर फैला हुआ है, इससे 'वियत्' है। 'व्योम'—शब्द । नाना भावेन एतद् अवति भूतानि,—इति व्योम । नाना प्रकारसे अवकाश दानसे यह भूतोंकी रक्षा करता है, इससे व्योम है। इसी प्रकार अन्य शब्दोंमें ऊहा करना ।