निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ७१ भाष्यानुवादः । यह वह शब्द करता है जिससे गो प्रवृत्त हुई हुई मिमाती है । या मायु = शब्दको करतो है । अथवा मायु नाम आदित्यके समान [ अपनेको बनाती है । ] यह वाक् देवता मध्यम लोककी है । ध्वं- सन या, मेघमें टिकी हुई । वह चित्तिरों या चटचटा शब्दोंसे विद्युत् होती हुई मनुष्यको झुका देती है । "वव्रि" को लौटाती है । "वव्रि" यह रूपका नाम है । 'वृणोति' ढांप लेता है, इस कर्त्तृवाच्य क्रियासे है। वृष्टिसे पृथिवीको ढांपकर उसे फिर ले लेती है ॥ ५ ॥ व्याख्या । शाकपूर्णि आचार्यको उभयलिङ्गा देवताने, देवतातत्वके जान- नेके लिये जो ऋचा दी थी, वह यह "अयं स शिङ्क्ते" ऋचा है । यह ऋचा एक ही वाक्यमें अपने एक ही स्तवनीय। देवताको, "अयम्, सः" इन पुँल्लिङ्ग पदोंसे पुरुष रूपमे, और "गौः, अभीवृत्ता" इत्यादि स्त्रीलिङ्गरूपदोंसे स्त्रीके रूपमें कह रही है । तथा उस एक ही देव- ताको मध्यमलोकके देवताके वर्षकर्मसे और उत्तमलोकके देवताके रसादान ( जलका खींच लेना ) कर्मसे स्तुति करती है । इससे नहीं जाना जाता, क्या यह पुरुष देवता है ? या स्त्री देवता है ? तथा यह मध्यमलोककी देवता है ? या उत्तम लोककी ? किन्तु विरुद्ध वाक्यों या धर्मोंकी एक वाक्यता करनेसे यह फलित निकल आता है कि,-वही एक देवता मेघरूपसे पुरुष और वाक्रूपसे स्त्री है । एवम् विद्युद्-रूपसे मध्यम स्थाना और आदित्यरूपसे उत्तम- स्थाना है । अर्थात्-वही एक वाग् देवता मेघमें शब्द सहित विद्युद्रूपसे स्थित होकर वर्षकर्मसे पृथिवीको आच्छादन करती है । सुतराम्, देवताका कोई नियत रूप नहीं है, वह महाभाग होती