निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ २ अ० २ पा० ५ खं० । है, उसको इच्छानुसार सब प्रकारके रूप धारण करनेका सामर्थ्य है, अतः उसके विरुद्धरूपों तथा कर्मोंमें सन्देहाकुल नहीं होना चाहिये । यही देवता-तत्त्वका रहस्य उभय लिङ्ग देवताने शाक- पूणि आचार्यको इस ऋचाके द्वारा समझाया है, और इसी प्रकार अन्यत्र अन्यत्र भी देवतातत्त्वके सन्देहको दूर करना चाहिये । यह मत किसी मनुष्यका नहीं, किसी ऋषिका नहीं, और न किसी अन्यका है। किन्तु, मन्त्र या वेद ऐसा कह रहा है, यह भी देव- ताकी कृपासे उसके द्वारा ऋषिको मिला है, और एक दूसरे ऋषिने ही उसका भाष्य किया है । अब वेद वेदाङ्गोंके माननेवाले उन मित्रोंको यहाँ ध्यानसे देखना चाहिये । जो देवताओंके अवतार और उनकी ऐसी कृपाओंमें सन्देह रखते हैं। पहिले ( २, २, ३-४ ) 'निऋ'ति' शब्द पर एक वाच्य-सन्देह- का उपदर्शन कराया है, कि—"निऋ'तिमाविवेश" यहाँ पर निऋ'ति पृथिवी है, या पाप्मा, और निर्णय किया है कि-परि- व्राजकोंके मतसे यह पाप्मा या दुःख हो सकता है, और नैरुक्तोंके मतसे पृथिवी । उसी प्रकार यह देवता-सन्देहका उदाहरण दिया है । अर्थात् जिस प्रकार मन्त्रोंमें वाच्य-सन्देह होता है, उसी प्रकार देवत.-सन्देह भी हो सकता है, यही सन्देह-सामान्य रूप पूर्व प्रकरणके साथ इस प्रकरणकी संगति है। अब शब्दोंके अनुक्रमणका अधिकार है, इसमें एक 'गो' शब्दका निर्वचन हो चुका है, उसमें निर्वचनके धर्म सब दिखाये गये, उसीके सादृश्य पर और शब्दोंका नवचन ऊहा पूर्वक कर लेना चाहिये । जैसे—'ग्मा' क्योंकि-'दूरं गता भवति' वह दूर गई हुई होती है, या “अस्यां गच्छन्ति भूतानि” इसमें प्राणी गमन करते हैं । 'ज्मा' “जमन्ति गच्छन्ति अस्यां भूतानि” इसमें भूत गमन करते हैं,— इत्यादि ।