निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
७२ २ अ० २ पा० ५ खं० । है, उसको इच्छानुसार सब प्रकारके रूप धारण करनेका सामर्थ्य है, अतः उसके विरुद्धरूपों तथा कर्मोंमें सन्देहाकुल नहीं होना चाहिये । यही देवता-तत्त्वका रहस्य उभय लिङ्ग देवताने शाक- पूणि आचार्यको इस ऋचाके द्वारा समझाया है, और इसी प्रकार अन्यत्र अन्यत्र भी देवतातत्त्वके सन्देहको दूर करना चाहिये । यह मत किसी मनुष्यका नहीं, किसी ऋषिका नहीं, और न किसी अन्यका है। किन्तु, मन्त्र या वेद ऐसा कह रहा है, यह भी देव- ताकी कृपासे उसके द्वारा ऋषिको मिला है, और एक दूसरे ऋषिने ही उसका भाष्य किया है । अब वेद वेदाङ्गोंके माननेवाले उन मित्रोंको यहाँ ध्यानसे देखना चाहिये । जो देवताओंके अवतार और उनकी ऐसी कृपाओंमें सन्देह रखते हैं। पहिले ( २, २, ३-४ ) 'निऋ'ति' शब्द पर एक वाच्य-सन्देह- का उपदर्शन कराया है, कि—"निऋ'तिमाविवेश" यहाँ पर निऋ'ति पृथिवी है, या पाप्मा, और निर्णय किया है कि-परि- व्राजकोंके मतसे यह पाप्मा या दुःख हो सकता है, और नैरुक्तोंके मतसे पृथिवी । उसी प्रकार यह देवता-सन्देहका उदाहरण दिया है । अर्थात् जिस प्रकार मन्त्रोंमें वाच्य-सन्देह होता है, उसी प्रकार देवत.-सन्देह भी हो सकता है, यही सन्देह-सामान्य रूप पूर्व प्रकरणके साथ इस प्रकरणकी संगति है। अब शब्दोंके अनुक्रमणका अधिकार है, इसमें एक 'गो' शब्दका निर्वचन हो चुका है, उसमें निर्वचनके धर्म सब दिखाये गये, उसीके सादृश्य पर और शब्दोंका नवचन ऊहा पूर्वक कर लेना चाहिये । जैसे—'ग्मा' क्योंकि-'दूरं गता भवति' वह दूर गई हुई होती है, या “अस्यां गच्छन्ति भूतानि” इसमें प्राणी गमन करते हैं । 'ज्मा' “जमन्ति गच्छन्ति अस्यां भूतानि” इसमें भूत गमन करते हैं,— इत्यादि ।
हिन्दी निरुक्त । ७३ नैघण्टुकास्तु ये शब्दाः प्रत्यर्थं गणसंस्थिताः । छन्दोभ्योऽन्विष्यतत्वार्थान् निर्ब्रूयात् योग- तस्तुतान् ॥ अर्थः-पृथक् पृथक् अर्थवाले गणोंमें जो नैघण्टुक शब्द हैं, उनको छन्दों या मन्त्रोंसे तत्वार्थ-सहित अन्वेषणा करके शास्त्रके नियमोंके अनुसार निर्वचन करे ॥ ५ ॥ इति हिन्दी निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयंपादः ।
७४ २ अ० ३ पा० १ खं० । : अथ तृतीयः पादः । [ निघण्टुः ] हेम ( १ ) । चन्द्रम् ( २ ) । रुक्मम् ( ३ ) । अयः ( ४ ) । हिरण्यम् ( ५ ) । पेशः ( ६ ) । कृशनम् ( ७ ) । लोहम् ( ८ ) । कनकम् ( ९ ) । काञ्चनम् ( १० ) । भर्म ( ११ ) । अमृतम् ( १२ ) । मरुत् ( १३ ) । दवम् ( १४ ) । जातरूपम् ( १५ ) । इति पञ्चदश हिरण्य नामानि ॥ २ ॥ अम्बरम् ( १ ) । वियत् ( २ ) । व्योम ( ३ ) । बर्हिः ( ४ ) । धन्व ( ५ ) । अन्तरिक्षम् ( ६ ) । आ- काशम् ( ७ ) । आपः ( ८ ) । पृथिवी ( ९ ) । भूः ( १० ) । स्वयम्भू ( ११ ) । अध्वा ( १२ ) । पुष्क- रम् ( १३ ) । सगरः ( १४ ) । समुद्रः ( १५ ) । अध्वरम् ( १६ ) । इति षोडश अन्तरिक्ष नामानि ॥ ३ ॥ [ खण्ड १ ] नि०-हिरण्य नामानि उत्तराणि पञ्चदश । हि- रण्यं कस्माद् ? ह्रियते आयम्यमानम्-इति वा । ह्रियते जनाद्-जनम्-इति वा । हितरमणं भवति-
- इति वा । हर्यतेर्वांस्यात् प्रेप्साकर्मणः ।
हिन्दी निरुक्त । ७५ अन्तरिक्ष नामानि उत्तराणि षोडश । अन्त- रिक्षं कस्माद् ? अन्तराक्षान्तं भवति । अन्तरा इमे इति वा । शरीरेषु-अन्तः-अक्षयम्-इति वा । तत्र समुद्र इत्येतत् पार्थिवेन समुद्रेण सन्दिह्यते । स- मुद्रः कस्मात् ? समुद्रवन्ति अस्माद्-आपः । सम- भिद्रवन्ति-एनम्-आपः । सम्मोदन्ते अस्मिन् भू- तानि । समुद्रको भवति । समुनत्ति-इति वा । तयोर्विभागस्तत्र-इतिहास मा चक्षते ।-देवापि ऋचार्ष्टिषेणः शन्तनुश्च कौरव्यौ भ्रातरौ बभूवतुः । सश्रन्तनुः कनीयान्-अभिषेच याञ्चक्रे । देवापिः- तपः प्रतिपेदे । ततः शन्तनो राज्ये द्वादश वर्षाणि देवो न ववर्ष । तम् ऊचु ब्राह्मणाः-‘अधर्मः त्वया चरितः’-‘जेष्ठं भ्रातरम्-अन्तरित्य-अभिषेचितम्’, त- स्मात् ते देवो न वर्षति’-इति । स शन्तनुर्देवापिं शिशिक्ष राज्येन । तम् उवाच देवापिः ‘पुरोहितः ते आसानि’ ‘याजयाति च त्वा’ इति । तस्य-एतद् वर्ष काम सूक्तं, तस्य-एषा भवति ॥ १ ॥ अनुवाद । प्रकृत पृथिवीके नामोंके अनन्तर पन्द्रह (१५) सुवर्णके नाम हैं । ‘हिरण्य’ क्यों-[ कहलाता है ? ] [ शिल्पी इसे कड़े-कुण्डल-
कण्ठे और बाजू आदि भूषणों के रूपमें] विस्तृत करनेके लिये हरण करते हैं। अथवा एक मनुष्यसे दूसरे मनुष्यके प्रति हरण किया जाता है। [क्योंकि-इससे व्यवहार होता है, इससे एक स्थानमें यह स्थित नहीं होता, किन्तु, सदा हरण ही किया जाता है।] अथवा हित और रमण होता है। क्योंकि-वह जिसके पास होता है, उसका दुर्भिक्ष आदिके समय हित होता है। तथा उसे लेकर चूहेको भी रति होती है, फिर मनुष्यको हो, इसमें कहना ही क्या है ? ] अथवा प्रेप्सा या प्रकृष्ट प्राप्त करनेकी इच्छा अर्थमें 'हृञ्' (भ्वा० उ०) धातुसे है। [क्योंकि-सभी इसे हरण या बहुत ही प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं।] सुवर्णके नामोंके अनन्तर सोलह (१६) अन्तरिक्ष या आकाशके नाम हैं। 'अन्तरिक्ष' क्यों बोला जाता है ? द्युलोक और भूलोक- के मध्यमें स्थित और पृथिवीके अन्त तक क्षान्त या फैला हुआ है। अथवा इन दोनों लोकोंके बीचमें निवास करता है। अथवा शरीरोंमें यही अक्षय-रूपसे भीतर रहता है, और पृथिवी आदि भूत क्षीण हो जाते हैं, इसी अक्षयत्व-रूप, धर्मसे यह 'अन्तरिक्ष' है। उन सोलह नामोंमें 'समुद्र' यह एक नाम पार्थिव या प्रसिद्ध समुद्र रूप अर्थसे मन्त्रोंमें सन्दिग्ध होता है। [क्योंकि-अन्तरिक्ष- के समान वह भी इस शब्दका दूसरा अर्थ है।] [जलाशय-पक्षमें ] क्योंकि-इससे लहरी तरङ्ग आदि रूपसे जल बहते हैं। इसमें भूत या जल-जन्तु संमोदन या बहु हर्ष करते हैं। [क्योंकि-यह अमोघ जल है।] अथवा उद्र या उदक इसमें संहत [इकट्ठा] है, इससे यह समुद्र है। अथवा यह सब जगत्को अपनेमेसे निकले हुए जलोंसे संक्लेदन या गीला करता है। उन दोनों अर्थोंका विभाग है। उसके उदाहरण मन्त्रके अर्थमें [आचार्य] इतिहास कहते हैं।—कुरुवंशमें ऋष्टिषेणके पुत्र देवापि
हिन्दी निरुक्त । ७७ और शन्तनु दो भाई थे । उन दोनोंमें छोटा जो शन्तनु था, उसने अपना अभिषेक कर लिया, और अभिषिक्त होकर राजा हो गया । दूसरा-जेष्ठ, देवापि तप करने चला गया । फिर शन्तनुके राज्यमें बारह वर्ष तक इन्द्र देवने वर्षा नहीं की । उसे ब्राह्मण बोले-तैने अधर्म किया, कि-जेष्ठको बीचमें छोड़ कर अपना अभिषेक कर लिया, इसी कारणसे-तेरे राज्यमें-देव नहीं बरसता है । उस शन्तनुने देवापिसे प्रार्थना की ; कि-यह राज्य प्रस्तुत है । देवापि उसे बोला कि-मै तेरा पुरोहित हो जाऊँ, और तुझे यज्ञ कराऊं । उस देवापिको इस वर्ष काम-सूक्तका आविर्भाव हुआ था । उस 'समुद्र' शब्दके जो जल-निधिके साथ सन्दिग्ध हैं, प्रविभागके दिखानेके लिये यह ऋचा निर्वचन करनेवाली है ॥ १ ॥ व्याख्या । इस खण्डमें पन्द्रह हिरण्य नामों और सोलह अन्तरिक्ष नामोंकी व्याख्या या भाष्य है । प्रायः सभी खण्डोंमें जो 'पञ्चदश' 'षोडश' आदि संख्या दी गई हैं, वह निघण्टु ग्रन्थमें पठित शब्दोंकी संख्या- का अनुवादमात्र है, किन्तु वह अन्य शब्दोंके निषेधके लिये नहीं। इससे असाम्नात या अपठित पर्याय शब्द भी तहाँ तहाँ व्याख्येय समझने चाहिये । जैसे कि-प्रथम खण्डमें 'हाटक' 'सुवर्ण' 'चामीकर' और शात कुम्भ आदि, और दूसरेमें दिव् 'द्यो' विहा- यस्,-आदि । पृथिवीमें ही सुवर्ण होता है, इस कारण पृथिवी नामोंके अन- न्तर 'हिरण्य' नाम कहे गये हैं । आद्य-खण्डमें एक 'हिरण्य' शब्दका ही निर्वचन किया है। उसमें दिखाया कि,एक ही हरण-क्रिया द्विविध सम्बन्धसे 'हिरण्य' शब्दको बनाती है, या उसे स्वर्ण-द्रव्यमें ले जासकती है। जैसे- [ १ ] शिल्पी भी कटक, कुण्डल आदि भूषणोंके बनानेको उसे
[७८] [२ अ० ३ पा० २ ख० ।]
हरण करते हैं। [२] अन्य अन्य मनुष्य, व्यवहारके लिये एकसे दूसरेके पास हरण करते हैं। तथा—'हित+रमण' और इच्छा- र्थक 'हर्य' [ भ्वा० प० ] धातुसे अर्थ और शब्दके सादृश्यसे 'हिर- ण्य'-शब्द बनाया है। इस शब्दके ढङ्ग पर ही अन्य 'हेम' 'चन्द्र' आदिकी व्याख्या करना चाहिये । जैसे—'हितं मम इदम्,' अर्थात् 'यह मेरा हित है,' ऐसा सभी पुरुष मानते हैं। इनसे 'हित+मम' इन दो पदोंके विकारसे 'हेम' पद बना । एवम् 'चदि' कान्तौ [ भ्वा० प० ] धातुसे 'चन्द्र' शब्द है। क्योंकि—'चन्दति इद सर्वः', अर्थात् इसे सब चाहते हैं,—इससे यह चन्द्र है । अन्तरिक्ष नामोंमें 'अन्तरिक्ष' और समुद्र' दो नामोंकी व्याख्या है। 'समुद्र' शब्दके दो अर्थ हैं, एक आकाश, और दूसरा समुद्र, इस निरुक्त-शास्त्रमें मन्त्रोंमें जिसके दो या अनेक अर्थ होते हैं, या हो सकते हैं, वह—सन्दिग्ध-पद बोला जाता है, यह इस शास्त्रकी शैली है । अन्तरिक्ष नामकी बनावट 'अन्तरा+क्षान्तम्' = 'अन्तरिक्षम्'— इस प्रकार, अन्तरा और क्षान्त इन दो पदोंसे मिलती है, और अर्थ भी उसके अर्थ-तत्त्वमें घट जाता है। ऐसे ही केवल 'अन्तरा' शब्द और 'अन्तर+अक्षय' इन दो शब्दोंसे भी निरुक्त होता है। 'अम्बर'—शब्द । 'अम्बुमत्-भवति, इति अम्बरम् । अर्थात्— अम्बु या जलवाला होता है, इस कारण 'अम्बर' है। 'वियत्'—शब्द । 'नाना भावेन सर्व तो वियतम्' इति वियत् । अनेक रूपसे सब ओर फैला हुआ है, इससे 'वियत्' है। 'व्योम'—शब्द । नाना भावेन एतद् अवति भूतानि,—इति व्योम । नाना प्रकारसे अवकाश दानसे यह भूतोंकी रक्षा करता है, इससे व्योम है। इसी प्रकार अन्य शब्दोंमें ऊहा करना ।
हिन्दी निरुक्त । ७६ आगे जो वर्षकाम—सूक्तकी ऋचा दी जाती है,—उसमें सन्दि- ग्ध ‘समुद्र’ पदके दोनों अर्थ मन्त्रार्थके सामर्थ्यसे ही स्पष्ट प्रतीत होते हैं ॥ १ ॥ [ खं० २ ] आर्ष्टिषेणोहोत्रमृषिर्निषीदन्देवापिर्देव सुमतिं चिकित्वा॒न् । उत्तरस्मा दधरं समुद्रमपो दि॑व्या अस्रजद्वर्ष्या अभि ॥” [ भा० ] “आर्ष्टिषेणः” ऋष्टिषेणस्य पुत्रः । इषितः षेणस्य इति वा । ‘सेना’ सेश्वरा । समान गतिर्वा । ‘पुत्र.’ पुरुत्रायते । निपरणाद् वा । ‘पु’ नरकं, ततः त्रायते इति वा । “होत्रम्—ऋषिः-निषीदन्” ।। ‘ऋषिः’ दर्श- नात् । ‘स्तोमान् ददर्श’-इति-औपमन्यवः । “तद्-यद्-एनान्—तपस्या मानान् ब्रह्म- स्वयम्भु—अभ्यानर्षत्, तद् ऋषीणाम्— ऋषित्वम्”—इति विज्ञायते । “देवापिः” देवानाम्-आप्त्या, स्तुत्याच प्रदानेन च । “देव सुमतिम्” देवानां कल्याणीं मतिम् । “चिकित्वा॒न्” चेतनावान् । “स उत्तर- स्माद्-अधरं समुद्रम्” । ‘उत्तरः’ उद्भूततरो
८० २ अ० ३ पा० २ खं० । भवति । ‘अधरः,’ ‘अधोरः,’ ‘अधः’ ‘न धावति’ इति उर्द्धगतिः प्रतिषिद्धा । तस्य-उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ २ ॥ अन्वयार्थः-‘आष्टिषेणो देवापिर्ऋषिः होत्रं’ कर्मप्रति ‘निषीदन्’ उपविष्टवान् । ततोऽपि ‘सः’ देव सुमतिम्’ ‘चिकित्वान्’ जानानः ‘उत्तर- स्मात्’ अन्तरिक्षात् समुद्रात् ‘अधरं’ पार्थिवं ‘समुद्रं’ प्रति [ एष विभागः समुद्रयोः । ] ‘दिव्याः’ ‘वर्ष्ण्याः’ वर्ष सम्बन्धिनीः ‘अपः’ जलानि ‘असृजत्’ अक्षारयत् — इत्यर्थः । ममापि इदानीं तथा एव अस्तु—इति वर्त- मानेन सम्बन्धः ॥ अनुवाद । मन्त्रार्थ-ऋष्टिषेण या इषितषेणका पुत्र ऋषि देवापि होताके कर्ममें बैठा। उससे भी उसने देवताओंकी कल्याणी मतिको, जो वर्षाको देनेवाली है, जानते हुएने उत्तर या अन्तरिक्ष समुद्रसे अधर या पृथिवीके समुद्रके प्रति सुन्दर वृष्टिके जलोंको गिराया था । इस समय मेरे लिये भी वैसाही हो । भाष्यार्थ-‘आष्टिषेण’ ऋष्टिषेणका पुत्र । अथवा इषितषेण, जिसने सेना भेजी हो, उसका । ‘सेना’ इन अर्थात् ईश्वर या प्रभुके सहित । अथवा समान या एकसी गतिवाली । ‘पुत्र’ पुरु=बहुत, त्रा=रक्षा करता है। अथवा ‘प’
हिन्दी निरुक्त । ८१ पालन पूरणयोः [ क्र्या० प० ] धातुसे । अर्थात् पितरोंको पिण्डदानसे पालन या पूरण करनेवाला। अथवा 'पुम्' नाम एक नरक है, उससे त्राण करनेवाला । “होत्रम्-ऋषः-निषी- दन्” यहाँ ऋषि शब्द दर्शन क्रियासे है । [क्योंकि-] 'उसने स्तोम या मन्त्रोंको देखा है, यह औपमन्यव आचार्य [ मानता है ] जो वह स्वयम्भू = दूसरेसे न होकर आपसे हुआ, ब्रह्म = वेद तप करते हुए इन ऋषियोंको प्राप्त हुआ, यही ऋषियोंका ऋषिपना है, यह [ ब्राह्मणमें—] जाना गया है। ‘देवापि’ [ क्यों ? ] देवताओंकी प्राप्ति अर्थात् स्तुति अथवा प्रदानसे । 'देव सुमति' देवताओंको कल्या- णी = वर्षाके देनेवाली बुद्धिको 'चिकित्त्वान्' चेतनेवाला वह उत्तर नाम अन्तरिक्ष समुद्रसे अधर नाम पृथिवीके समुद्रके ऊपर । 'उत्तर'-[ क्यों ?-] बहुत उठा हुआ है। 'अधर' नीचेको न जानेवाला, और न दौड़नेवाला, अर्थात् ऊपरको, यह उर्द्ध-गतिका निषेध है, उसके बहुत निर्व- चन या व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥ २ ॥ व्याख्या । जिस देवापिको “आष्टिषेण” यह ऋचा प्रकट हुई, उस देवा- पिसे मन्त्रस्थ देवापि भिन्न और कल्पान्तरका था । उसी प्रकार शान्तनु भी दो ही थे । क्योंकि-मन्त्रमें देवापि किसी पूर्वकालके देवापिके इतिहासको श्रवण या दर्शन कर रहा है । इससे मन्त्रार्थ- के अन्तमें ‘इस समय मेरे लिये भी ऐसा ही हो' अवर या पीछेका देवापि जो इस मन्त्रका देखनेवाला है, की—ओरसे जोड लेना चाहिये । ऐसा करनेसे मन्त्रका वर्त्तमानसे सम्बन्ध हो जाता है । ऐसी योजना प्रयोजनानुसार अन्यत्र भी कर लेना चाहिये । क्योंकि- जो कोई भी मन्त्रका प्रयोग करता है, वह अपने स्वार्थके लिये ११ •
८२ २ अ० ३ पा० २ खं० । करता है, और प्रयोग कर्त्ताका स्वार्थ उसके समान कालमें होता है। तथा मन्त्रकी अर्थवत्ता वर्त्तमान कर्मके स्मरण करानेके द्वारा ही सार्थक होती है। 'समुद्र' शब्द अन्तरिक्ष और पार्थिवसमुद्र दोनोंके लिये आता है, यही बात पुष्ट करनेके अर्थ यह ऋचा दी गई है। इसमें कहा गया है कि– देवापिने ऊपरके समुद्रसे नीचेके समुद्रमें वृष्टि करवाई' इससे स्पष्ट रूपसे दोनों अर्थोंमें 'समुद्र' शब्दका होना सिद्ध हो जाता है। 'ऋष्टिषेण'—'ऋष्टि' एक आयुध होता है, जिसके सेनामें ऋष्टि आयुध बहुत हों, वह ऋष्टिषेण होता है। अथवा 'ऋष्टिषेण' से इषितसेन लेना। अर्थात्—जो शत्रुओंके प्रति नित्य ही सेना भेजता है वह 'ऋष्टिषेण' है। 'सेना'—'इन' यह ईश्वरका नाम है, वह नित्य ही नेतासे संयुक्त रहती है। अथवा समान गति होती है, अर्थात् एक जयरूप अर्थके उद्देश्यसे सदा जाती है। 'पुत्र' क्यों ?—पिताने चाहे बहुत भी पाप किये हों, तोभी उनसे उसकी रक्षा कर लेता है। 'ऋषि' शब्द दर्शन क्रियासे सम्बन्ध रखता है। क्योंकि—वह [ऋषि] सूक्ष्म अर्थोको देख लेता है। उपमन्युका पुत्र मानता है कि—मन्त्रोंके दर्शन करनेसे 'ऋषि' है। इसी अर्थमें ब्राह्मण भी साक्ष्य देता है। इस ऋचाके ऐतिहासिक अर्थको अगली ऋचा बहुत कुछ कहती है,—जैसे—देवापिने उत्तर समुद्रसे वृष्टिकी देवताओंसे याचना की, जैसे—उसने पुरोहितता की, और जिस प्रकार शन्तनुको जिस कर्मसे यज्ञ कराया ॥ २ ॥
हिन्दी निरुक्त। ८३ [ खं० ३ ] “यद्देवापिः शन्तन्वे पुरोहितो होत्राय वृतः कृपयन्नदीधेत् । देवश्रुतं वृष्टिवनिं रराणो बृहस्पति- र्वा च मस्मै अयच्छत् ॥” [ भा० ] “शन्तनुः” शंतनो रस्त्वति वा । शम्- अस्मैतन्वस्त्विति वा । “पुरोहितः” पुरः एनं दधति । “होत्राय वृतः” कृपा- यमाणः-अन्वध्यायत् । “देवश्रुतं” देवा एनं शृण्वन्ति । वृष्टि याचितं “रराणः” रातिः- अभ्यस्तः । “बृहस्पतिः” ब्रह्मा आसीत्, सः “अस्मै” “वाचम्-अयच्छत्” । ‘बृहत्’- उपव्याख्यातम् ॥ ३ ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ २, ३ ॥ अन्वयार्थः-“यत्” यदा “देवापिः शन्तजवे” राज्ञे “होत्राय” वर्षार्थीय कर्मणि होतृकर्मणे “वृतः” सन् “कृपयन्” राज्ञः शन्तनोः कृपायमाणः “अदीधेत्” वृष्टिर्भवेत्-इति अन्वध्यायत्, तदा ‘वृष्टिवनि’ वृष्टियाचिनम् एनं “देवश्रुतं” देवापि “रराणो” ददत् “बृहस्पति“ ब्रह्मा आसीत् । ब्रह्मत्वे च
८४ २ अ० २ पा० ३ खं० । अवस्थितः सः "अस्मै" "वाचम्"-वर्षसा- धिकां-"अयच्छत्"-अददत्-इत्यर्थः । अनुवादः । [ मन्त्रार्थः ] जिस समय देवापि शन्तनु राजाके अर्थ वर्षाके साधक कर्ममें होताके कर्मके लिये वरण किया गया और उसने राजा शन्तनु पर कृपा करते हुए, ध्यान किया कि-इसके राज्यमें वृष्टि हो, तब वृष्टिके याचन करनेवाले देवापिको देते हुए बृहस्पति ब्रह्मा हुए और ब्रह्मत्वमें स्थित होकर उसने इस देवापिको वृष्टिके देनेवाली वाणी दी । [ एकपद निरुक्त ] 'शन्तनु'-'शम्' नाम सुखका और 'तनु' नाम शरीरका है । इन्हीं दो शब्दोंसे 'शन्तनु' शब्द बना । जिसका अर्थ यह होता है कि-वह किसीको रोगार्त्त देखकर कहता है कि-तेरे शरीरका कल्याण हो, तो वह नीरोग हो जाता है । अथवा इसको शरीरका सुख हो, इस प्रकार वह इच्छा करता है । 'पुरोहित' 'पुरः' नाम पहिले 'हित' धारण किया गया, अर्थात्- राजा लोग शान्ति पौष्टिक और आभिचारिक कर्मोंमें इससे पहिले धारण करते हैं, या आगे करते हैं। 'देवश्रुत्' 'देवाः एनम्-स्तुतीः-उच्चारयन्तं शृण्वन्ति इति-'देव- श्रुत्' । अर्थात्-जब वह स्तुतियोंका उच्चारण करता है, तब देवता उसे सुनते हैं । 'रराज' 'रा' दाने ( अदा० प० ) धातुका दोहराया हुआ रूप है। अर्थात् बहुत दान करनेवाला या उदार ।
'बृहन्'–यह शब्द 'बृहस्पति' शब्दके अन्तर्गत् है। 'बृहत्' नाम 'महान्' या 'पूजनीय' का है, इसकी पहिले (१. ३. २) व्याख्या हो चुकी है। पूजनीयों का जो पति है, वह 'बृहस्पति' कहलाता है ॥३॥ व्याख्या । “यद्देवापिः”–इस मन्त्रमें कहे हुए इतिहाससे यह निकलता है, कि–किसी अवस्था विशेषमें यज्ञकर्ममें ब्रह्मासे अतिरिक्त वर्ण- का मनुष्य भी यदि–यजमानका सवर्ण सहोदर भ्राता हो, कर सकता है। किन्तु ब्रह्माकी अनुमति उसे मिले। ब्रह्मा चारों वेदों व वेदोक्त सकल धर्मका ज्ञाता ब्राह्मण होता है। तथा इसी कारण उसके कर्त्तव्यमें कर्मका अवेक्षण एवम् उसकी त्रुटियोंके प्रायश्चित्तका अनुष्ठान है। श्रौत तथा स्मार्त्त कर्मोंमे ब्रह्मा व्यवस्थापक होता है। अतएव देवापिको अपने भाईके कष्ट पर करुणा आई [“कृपयन्न दीधेत्”] और उसने उसके कल्याणके अर्थ उसके होतृ-कर्ममें संयुक्त होना चाहा, (होत्रायवृतः) किन्तु वह क्षत्रिय था, उसे आर्त्विज्यका अधिकार नहीं था। क्योंकि– आर्त्विज्य ब्राह्मणोंका ही होता है, यह जैमिनीय पूर्व मीमांसामे' निर्णीत है। इससे शन्तनु राजाके वृष्टि साधन यज्ञमे' बृहस्पति ब्रह्माने देवापिको आज्ञा दी। “बृहस्पतिर्वाचमस्मा अयच्छत्॥ यद्यपि–इसी प्रकरणमें पहिले भगवद्दुर्गाचार्यने कहा है कि– “देवापि विश्वामित्रके समान तीव्र तपसे ब्राह्मण हो गया था” तथापि मन्त्र और यास्क मुनिके अक्षरोंसे यह बात नहीं कही गई है, इससे नितराम् मान्य नहीं हो सकती। हाँ, मेरा यह अभि- प्राय नहीं, कि–ऐसा हो ही नहीं सकता, बल्कि-जाति ब्राह्मण नहीं, तो कर्म. ब्राह्मण हो सकता है। आपत्-कालमें अन्य, वर्णके मनुष्य अन्य-वर्णकी वृत्तियोंको करने लगते है। और वे। वृत्तिके अनुसार वर्णान्तरके नामकी गौण प्रथासे व्यवहृत होने लगते है, तथा उनके
८६ २ अ० ३ पा० ३ ख० । जाति व्यवहार जन्म-सम्बन्धी पूर्व-वर्णमें ही होते हैं, और होने चाहिये । ऐसी कई जाति इस समयमें भी हैं जो सुवर्णकार आदि जातिका कार्य करते हैं, तथा उनकी जातिका प्रसिद्ध नाम भी 'सुवर्णकार' आदि हो गया है, किन्तु उनके धार्मिक व सामाजिक व्यवहार क्षत्रिय आदि पूर्व जातिके अनुसार होते हैं । अतः जन्मसे जो प्राचीन पृथक् जाति या वर्ण हैं, उनमें कुछ लोग कर्मको प्रयो- जकता लेकर गोलमाल करते हैं, यह शास्त्रीय मर्यादा नहीं है, और न अच्छी ही है, क्योंकि-जाति स्थायि वस्तु है, उसका निमित्त भी वैसा ही चाहिये, किन्तु कर्म कोई स्थायि वस्तु नहीं है ॥ ३ ॥ इति हिन्दी निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥३॥
हिन्दी निरुक्त । ८७ चतुर्थः पादः । ( खण्ड १ ) ( निघ० ) स्वः ( १ ) । पृश्निः ( २ ) । नाकः (३) । गौः ( ४ ) । विष्टप् ( ५ ) । नभः ( ६ ) । इति षट् साधारणानि ॥ ४ ॥ ( निरु० ) साधारणानि-उत्तराणि षड्, दिवश्च आ- दित्यस्य च । यानि तु-अस्य प्राधान्येन- उपरिष्टात्-तानि व्याख्यास्यामः । आदित्यः कस्मात् ? आदत्ते रसान् । आदत्ते भासं ज्योतिषाम् । आदोप्तो भासा-इति वा । अदितेः पुत्रः-इति वा । अल्पप्रयोगं तु- अस्य-एतत्-ऋर्चाभ्नाये । सूक्तभाक् । “सूर्य॑ मा॑दि॒तेयम्” [ऋ० सं० ८, ४, १२, १] एवमन्यासामपि देवतानाम्-आदित्यप्रवादाः स्तु- तयो भवन्ति । तद् यथायतद्-मित्रस्य, वरुणस्य, अर्यम्णः, दक्षस्य, भगस्य, अंशस्य-इति । अथापि मित्रावरुणयो— “आदित्यः दानु॑नस्पती”[ऋ०सं०२, ८, ८, १]दानपती । अथापि मित्रस्य-एकस्य—
४८ २ अ० ४ पा० १ खं० । “प्रसमित्म॒र्त्तो अ॑स्तु॒ प्रय॑स्वान्यस्त॑ आदित्य॒ शिक्ष॑ति व्र॒तेन॑”-इत्यपि निगमो भवति [ऋ० सं० ३, ४, ५, २] अथापि वरुणस्य-एकस्य — “अथा वय मादित्य व्रते तव” [ऋ० सं० १, २, १५, ५] ‘व्रतम्’-इति कर्मनाम, ‘वृणोति’-इति सतः। इदमपि इतरत्-व्रतम्-एतस्मादेव, निवृत्तिकर्म, ‘वार- यति’-इति सतः। ‘अन्नम्’-अपि व्रतम्-उच्यते, यद् आवृणोति शरीरम् ॥ १ ॥ अर्थ । अन्तरिक्ष-नामोंके आगे दिव् और आदित्यके साधारण या साझेके छः (६) नाम हैं। किन्तु इस आदित्यके जो नाम प्रधान स्तुतिके भागी हैं, उनकी व्याख्या ऊपर या दैवतकाण्ड या सत्तर- हवें अध्याय (दै० का० ६, २, १—३, ६) में करेंगे। ‘आदित्य किस हेतुसे है?। रसोंका आदान या ग्रहण करता है। ज्योतियों या ग्रह-नक्षत्रोंकी दीप्तिको ले लेता है। अथवा भास् या प्रकाशसे आवरण किया हुआ है। अथवा अदितिका पुत्र है। इस अर्थका ‘आदित्य’ शब्द ऋग्वेदमें बहुत कम आता है। अदितिकी पुत्रताका बोधक ‘आदित्य’नाम प्रायः करके सूक्तमें देवताकी स्तुतिके लिये ही आता है, कदाचित् हविके विधायक वाक्यमें भी। [उदाहरण] “यद्दे- वेनमदधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम्” अर्थात्-‘जब ही यज्ञके योग्य देवताओंने इस आंग्र और अदितिके पुत्र सूर्यको द्युलो- कमें स्थापन किया।’ [ऐसे ही] अन्य देवताओंकी भी ‘आदित्य’ विशेषणसे स्तुति होती हैं। सो जैसे-यह-मित्रकी, वरुणकी, अर्य्यमाकी, दक्षकी, भगकी, अंशकी,। और भी मित्र और वरुण
हिन्दी निरुक्त । ८६ दोनों मिलित देवताओंकी-[ उदाहरण ] आदित्या दानुनस्पती" । अर्थात् अदितिके पुत्र और दानके पति [ मित्रावरुण है । ] दानके पति । और भी अकेले मित्रकी स्तुतिमें “प्रसमित्र०” । अर्थात् ‘हे मित्र ! अदितिके पुत्र ! वह मनुष्य अन्नवान् हो, जो तेरे लिये निर्वपण आदि कर्मसे संस्कार करके इस चरु-रूप हविः को देता है’ यह निगम होता है। और भी अकेले वरुणको ‘आदित्य’ नामसे स्तुतिमें—“अथाव ” । ‘हे अदितिके पुत्र ! हम तेरे व्रतमें आदर-युक्त हों।’ [ यह निगम है ।] ‘व्रत’ यह कर्मका नाम है। [ क्योकि- ] वह कर्त्ताको आवरण कर लेता है। कर्त्तृवाच्य ‘वृञ्’ ( स्वा० उ० ) धातुसे । यह भी दूसरा ‘व्रत’ शब्द जो यम, नियम आदिका वाचक है इसी धातुसे होता है। यहाँ निवृत्ति , अर्थ है। कर्त्तृवाच्य णिजन्त ‘वारयति’ इस क्रियारूपसे है। अन्न भी व्रत कहाता है। जो शरीरको आवरण या व्यापन कर लेता है ॥ १ ॥ व्याख्या । द्युलोक भी अन्तरिक्षका ही एक उच्चतम भाग है, एवम् उसीमें आदित्यमण्डल घूमता है, इससे अन्तरिक्षनामोंके अनन्तर इन दोनोंके साधारण नाम कहे गये हैं। यद्यपि देवताओंके नामोंकी व्याख्याके लिये दैवतकाण्ड स्वतन्त्र स्थान है, अतः आदित्यके नाम होनेसे ये उसी काण्डमें चाहिये, तथापि द्युलोकके सम्बन्धसे ये नाम यहाँ नैघण्टुक काण्डमें संग्रह किये गये हैं। इसीसे जिन आदित्यके नामोंसे मन्त्रोंमें आदित्यकी मुख्यतासे स्तुति आती है, उन ‘सविता’, भग’ आदि नामोंकी व्याख्या दैवतकाण्डमें ही होगी । व्याख्येय ‘खः’ आदि छः नामोंमें भाष्यकारको कुछ अल्प वक्तव्य है, किन्तु इनके व्याख्याभूत ‘आदित्य’ शब्दमे अनेक विशेष
६० २ अ० ४ पा० १ खं० । हैं, उन्हींके उद्घाटन करनेके लिये कौतुकवश पहिले ही यह प्रश्न उठाते हैं—'आदित्यः कस्मात्' ? यहाँ पर 'आदित्य' शब्दके चार अर्थ दिखाये हैं, जिनमें प्रथम तीन अर्थ-रसोंका आदान, ज्योतियों- की दीप्तिका आदान और प्रकाशसे व्याप्त होना, आदित्य मात्रमें घटते हैं, और चतुर्थ अर्थ 'अदितिका पुत्रभाव' सूर्य तथा अन्य मित्र आदि सब देवताओंमें साधारण है, इससे उस अर्थको लेकर यह 'आदित्य' शब्द और देवताओंके लिये भी विशेषणरूपसे आता है। भगवद्दुर्गाचार्यने “अल्पप्रयोगं तु अस्यैतद् आर्चाम्याम्नाये” यह पंक्ति 'आदितेय' नामके अभिप्रायसे और 'सूक्तभाक्, सूर्यमादि- तेयम्'-यह पङ्क्ति 'आदितेय' नामके अभिप्रायसे लगाई है, किन्तु हमारे विचारमें “आदित्यः कस्मात्” से “अथाप्ययमादित्य व्रते तव” तक आदित्य शब्दका ही सम्बन्ध है। आपको प्रकरण भेद करनेका मुख्य कारण “सूर्यमादितेयम्” यह उदाहरण है, इसीके कारण आपने 'सूक्तभाक्' इस वाक्यके लिये 'आदितेयः इति' का अध्या- हार किया। किन्तु वास्तवमें यह ठीक नहीं प्रतीत होता। वस्तुतः 'सूर्यमादितेयम्' यह सूर्यमें आदित्य प्रवाद स्तुतिका उदाहरण ही है। इसीसे 'अन्यसामपि देवता नामादित्यप्रवादाः स्तुतयो भवन्ति'—इस अग्रिम पङ्क्तिमें अपि शब्द दिया है। जिसका अभि- प्राय यह है कि जिस प्रकार 'सूर्यमादितेयम्' इस उक्त उदाहरणमें सूर्यकी आदित्यप्रवाद स्तुति है, उसी प्रकार और देवताओंकी भी हैं। यास्कके अभिप्रायमें 'आदित्य' और 'आदितेय' दोनों समानार्थ हैं। इसके अतिरिक्त यह भी है कि 'आदित्य' शब्दके प्रथम तीन निर्वचन प्रत्यक्ष सिद्ध हैं, किन्तु चतुर्थ निर्वचन ही प्रमाणापेक्ष है, इससे यह उदाहरण दिया है, जिससे सूर्यको अदितिपुत्रता स्पष्ट उक्त होती है।
६२ २ अ० ४ पा० २ ख०। आदित्यप्रवादाः। आदित्येन आदित्य-इति नाम्ना प्रवादः प्रकर्षेण वादः स्तवनं यासु, ताः आदित्यप्रवादाः। जिन स्तुतियोंमे आदित्य नामसे विशेष कर स्तुति या कथन हो वे स्तुतियें आदित्य- प्रवाद होती हैं ॥ १ ॥ (खण्ड २) (निरु०) 'स्वः'—आदित्यो भवति । सु-अरणः, सु-ईरणः। स्वृतो रसान् । स्वृतो भासं ज्योति- षाम्। स्वृतो भाषा-इति वा। एतेन द्यौ व्याख्याता । 'पृश्निः' आदित्यो भवति । प्राश्नुते- एनं वर्णः-इति नैरुक्ताः । संस्पृष्टा रसान् । संस्पृष्टा भासं ज्योतिषाम् । संस्पृष्टो भासा-इति वा । अथ द्यौः-संस्पृष्टा ज्योतिर्भिः पुण्यकृद्भिञ्च । 'नाकः' आदित्यो भवति । नेता भासाम् । ज्योतिषां प्रणयः। अथ द्यौः-'कम्'-इति सुखनाम, तत् प्रतिषिद्धं प्रतिषिध्येत । “न वा अमुं लोकं जग्मुषे किञ्च नाकम्” । न वा अमुं लोकं जग्मुषे किञ्चन-असुखम्, पुण्यकृतो हि-एव तत्र गच्छन्ति। 'गौः' आदित्यो भवति । गमयति रसान् । गच्छति-अन्तरिक्षे । अथ “द्यौ”-यत्-पृथिव्या अधि दूरं गता भवति । यच्च-अस्यां ज्योतींषि गच्छन्ति । 'विष्टप्' आदित्यो