भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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८० २ अ० ३ पा० २ खं० । भवति । ‘अधरः,’ ‘अधोरः,’ ‘अधः’ ‘न धावति’ इति उर्द्धगतिः प्रतिषिद्धा । तस्य-उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ २ ॥ अन्वयार्थः-‘आष्टिषेणो देवापिर्ऋषिः होत्रं’ कर्मप्रति ‘निषीदन्’ उपविष्टवान् । ततोऽपि ‘सः’ देव सुमतिम्’ ‘चिकित्वान्’ जानानः ‘उत्तर- स्मात्’ अन्तरिक्षात् समुद्रात् ‘अधरं’ पार्थिवं ‘समुद्रं’ प्रति [ एष विभागः समुद्रयोः । ] ‘दिव्याः’ ‘वर्ष्ण्याः’ वर्ष सम्बन्धिनीः ‘अपः’ जलानि ‘असृजत्’ अक्षारयत् — इत्यर्थः । ममापि इदानीं तथा एव अस्तु—इति वर्त- मानेन सम्बन्धः ॥ अनुवाद । मन्त्रार्थ-ऋष्टिषेण या इषितषेणका पुत्र ऋषि देवापि होताके कर्ममें बैठा। उससे भी उसने देवताओंकी कल्याणी मतिको, जो वर्षाको देनेवाली है, जानते हुएने उत्तर या अन्तरिक्ष समुद्रसे अधर या पृथिवीके समुद्रके प्रति सुन्दर वृष्टिके जलोंको गिराया था । इस समय मेरे लिये भी वैसाही हो । भाष्यार्थ-‘आष्टिषेण’ ऋष्टिषेणका पुत्र । अथवा इषितषेण, जिसने सेना भेजी हो, उसका । ‘सेना’ इन अर्थात् ईश्वर या प्रभुके सहित । अथवा समान या एकसी गतिवाली । ‘पुत्र’ पुरु=बहुत, त्रा=रक्षा करता है। अथवा ‘प’

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