निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ८१ पालन पूरणयोः [ क्र्या० प० ] धातुसे । अर्थात् पितरोंको पिण्डदानसे पालन या पूरण करनेवाला। अथवा 'पुम्' नाम एक नरक है, उससे त्राण करनेवाला । “होत्रम्-ऋषः-निषी- दन्” यहाँ ऋषि शब्द दर्शन क्रियासे है । [क्योंकि-] 'उसने स्तोम या मन्त्रोंको देखा है, यह औपमन्यव आचार्य [ मानता है ] जो वह स्वयम्भू = दूसरेसे न होकर आपसे हुआ, ब्रह्म = वेद तप करते हुए इन ऋषियोंको प्राप्त हुआ, यही ऋषियोंका ऋषिपना है, यह [ ब्राह्मणमें—] जाना गया है। ‘देवापि’ [ क्यों ? ] देवताओंकी प्राप्ति अर्थात् स्तुति अथवा प्रदानसे । 'देव सुमति' देवताओंको कल्या- णी = वर्षाके देनेवाली बुद्धिको 'चिकित्त्वान्' चेतनेवाला वह उत्तर नाम अन्तरिक्ष समुद्रसे अधर नाम पृथिवीके समुद्रके ऊपर । 'उत्तर'-[ क्यों ?-] बहुत उठा हुआ है। 'अधर' नीचेको न जानेवाला, और न दौड़नेवाला, अर्थात् ऊपरको, यह उर्द्ध-गतिका निषेध है, उसके बहुत निर्व- चन या व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥ २ ॥ व्याख्या । जिस देवापिको “आष्टिषेण” यह ऋचा प्रकट हुई, उस देवा- पिसे मन्त्रस्थ देवापि भिन्न और कल्पान्तरका था । उसी प्रकार शान्तनु भी दो ही थे । क्योंकि-मन्त्रमें देवापि किसी पूर्वकालके देवापिके इतिहासको श्रवण या दर्शन कर रहा है । इससे मन्त्रार्थ- के अन्तमें ‘इस समय मेरे लिये भी ऐसा ही हो' अवर या पीछेका देवापि जो इस मन्त्रका देखनेवाला है, की—ओरसे जोड लेना चाहिये । ऐसा करनेसे मन्त्रका वर्त्तमानसे सम्बन्ध हो जाता है । ऐसी योजना प्रयोजनानुसार अन्यत्र भी कर लेना चाहिये । क्योंकि- जो कोई भी मन्त्रका प्रयोग करता है, वह अपने स्वार्थके लिये ११ •