निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ २ अ० ३ पा० २ खं० । करता है, और प्रयोग कर्त्ताका स्वार्थ उसके समान कालमें होता है। तथा मन्त्रकी अर्थवत्ता वर्त्तमान कर्मके स्मरण करानेके द्वारा ही सार्थक होती है। 'समुद्र' शब्द अन्तरिक्ष और पार्थिवसमुद्र दोनोंके लिये आता है, यही बात पुष्ट करनेके अर्थ यह ऋचा दी गई है। इसमें कहा गया है कि– देवापिने ऊपरके समुद्रसे नीचेके समुद्रमें वृष्टि करवाई' इससे स्पष्ट रूपसे दोनों अर्थोंमें 'समुद्र' शब्दका होना सिद्ध हो जाता है। 'ऋष्टिषेण'—'ऋष्टि' एक आयुध होता है, जिसके सेनामें ऋष्टि आयुध बहुत हों, वह ऋष्टिषेण होता है। अथवा 'ऋष्टिषेण' से इषितसेन लेना। अर्थात्—जो शत्रुओंके प्रति नित्य ही सेना भेजता है वह 'ऋष्टिषेण' है। 'सेना'—'इन' यह ईश्वरका नाम है, वह नित्य ही नेतासे संयुक्त रहती है। अथवा समान गति होती है, अर्थात् एक जयरूप अर्थके उद्देश्यसे सदा जाती है। 'पुत्र' क्यों ?—पिताने चाहे बहुत भी पाप किये हों, तोभी उनसे उसकी रक्षा कर लेता है। 'ऋषि' शब्द दर्शन क्रियासे सम्बन्ध रखता है। क्योंकि—वह [ऋषि] सूक्ष्म अर्थोको देख लेता है। उपमन्युका पुत्र मानता है कि—मन्त्रोंके दर्शन करनेसे 'ऋषि' है। इसी अर्थमें ब्राह्मण भी साक्ष्य देता है। इस ऋचाके ऐतिहासिक अर्थको अगली ऋचा बहुत कुछ कहती है,—जैसे—देवापिने उत्तर समुद्रसे वृष्टिकी देवताओंसे याचना की, जैसे—उसने पुरोहितता की, और जिस प्रकार शन्तनुको जिस कर्मसे यज्ञ कराया ॥ २ ॥