निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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८६ २ अ० ३ पा० ३ ख० । जाति व्यवहार जन्म-सम्बन्धी पूर्व-वर्णमें ही होते हैं, और होने चाहिये । ऐसी कई जाति इस समयमें भी हैं जो सुवर्णकार आदि जातिका कार्य करते हैं, तथा उनकी जातिका प्रसिद्ध नाम भी 'सुवर्णकार' आदि हो गया है, किन्तु उनके धार्मिक व सामाजिक व्यवहार क्षत्रिय आदि पूर्व जातिके अनुसार होते हैं । अतः जन्मसे जो प्राचीन पृथक् जाति या वर्ण हैं, उनमें कुछ लोग कर्मको प्रयो- जकता लेकर गोलमाल करते हैं, यह शास्त्रीय मर्यादा नहीं है, और न अच्छी ही है, क्योंकि-जाति स्थायि वस्तु है, उसका निमित्त भी वैसा ही चाहिये, किन्तु कर्म कोई स्थायि वस्तु नहीं है ॥ ३ ॥ इति हिन्दी निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥३॥