भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 1282 में से

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'बृहन्'–यह शब्द 'बृहस्पति' शब्दके अन्तर्गत् है। 'बृहत्' नाम 'महान्' या 'पूजनीय' का है, इसकी पहिले (१. ३. २) व्याख्या हो चुकी है। पूजनीयों का जो पति है, वह 'बृहस्पति' कहलाता है ॥३॥ व्याख्या । “यद्देवापिः”–इस मन्त्रमें कहे हुए इतिहाससे यह निकलता है, कि–किसी अवस्था विशेषमें यज्ञकर्ममें ब्रह्मासे अतिरिक्त वर्ण- का मनुष्य भी यदि–यजमानका सवर्ण सहोदर भ्राता हो, कर सकता है। किन्तु ब्रह्माकी अनुमति उसे मिले। ब्रह्मा चारों वेदों व वेदोक्त सकल धर्मका ज्ञाता ब्राह्मण होता है। तथा इसी कारण उसके कर्त्तव्यमें कर्मका अवेक्षण एवम् उसकी त्रुटियोंके प्रायश्चित्तका अनुष्ठान है। श्रौत तथा स्मार्त्त कर्मोंमे ब्रह्मा व्यवस्थापक होता है। अतएव देवापिको अपने भाईके कष्ट पर करुणा आई [“कृपयन्न दीधेत्”] और उसने उसके कल्याणके अर्थ उसके होतृ-कर्ममें संयुक्त होना चाहा, (होत्रायवृतः) किन्तु वह क्षत्रिय था, उसे आर्त्विज्यका अधिकार नहीं था। क्योंकि– आर्त्विज्य ब्राह्मणोंका ही होता है, यह जैमिनीय पूर्व मीमांसामे' निर्णीत है। इससे शन्तनु राजाके वृष्टि साधन यज्ञमे' बृहस्पति ब्रह्माने देवापिको आज्ञा दी। “बृहस्पतिर्वाचमस्मा अयच्छत्॥ यद्यपि–इसी प्रकरणमें पहिले भगवद्दुर्गाचार्यने कहा है कि– “देवापि विश्वामित्रके समान तीव्र तपसे ब्राह्मण हो गया था” तथापि मन्त्र और यास्क मुनिके अक्षरोंसे यह बात नहीं कही गई है, इससे नितराम् मान्य नहीं हो सकती। हाँ, मेरा यह अभि- प्राय नहीं, कि–ऐसा हो ही नहीं सकता, बल्कि-जाति ब्राह्मण नहीं, तो कर्म. ब्राह्मण हो सकता है। आपत्-कालमें अन्य, वर्णके मनुष्य अन्य-वर्णकी वृत्तियोंको करने लगते है। और वे। वृत्तिके अनुसार वर्णान्तरके नामकी गौण प्रथासे व्यवहृत होने लगते है, तथा उनके

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