निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ २ अ० २ पा० ३ खं० । अवस्थितः सः "अस्मै" "वाचम्"-वर्षसा- धिकां-"अयच्छत्"-अददत्-इत्यर्थः । अनुवादः । [ मन्त्रार्थः ] जिस समय देवापि शन्तनु राजाके अर्थ वर्षाके साधक कर्ममें होताके कर्मके लिये वरण किया गया और उसने राजा शन्तनु पर कृपा करते हुए, ध्यान किया कि-इसके राज्यमें वृष्टि हो, तब वृष्टिके याचन करनेवाले देवापिको देते हुए बृहस्पति ब्रह्मा हुए और ब्रह्मत्वमें स्थित होकर उसने इस देवापिको वृष्टिके देनेवाली वाणी दी । [ एकपद निरुक्त ] 'शन्तनु'-'शम्' नाम सुखका और 'तनु' नाम शरीरका है । इन्हीं दो शब्दोंसे 'शन्तनु' शब्द बना । जिसका अर्थ यह होता है कि-वह किसीको रोगार्त्त देखकर कहता है कि-तेरे शरीरका कल्याण हो, तो वह नीरोग हो जाता है । अथवा इसको शरीरका सुख हो, इस प्रकार वह इच्छा करता है । 'पुरोहित' 'पुरः' नाम पहिले 'हित' धारण किया गया, अर्थात्- राजा लोग शान्ति पौष्टिक और आभिचारिक कर्मोंमें इससे पहिले धारण करते हैं, या आगे करते हैं। 'देवश्रुत्' 'देवाः एनम्-स्तुतीः-उच्चारयन्तं शृण्वन्ति इति-'देव- श्रुत्' । अर्थात्-जब वह स्तुतियोंका उच्चारण करता है, तब देवता उसे सुनते हैं । 'रराज' 'रा' दाने ( अदा० प० ) धातुका दोहराया हुआ रूप है। अर्थात् बहुत दान करनेवाला या उदार ।