निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ २ अ० ४ पा० १ खं० । “प्रसमित्म॒र्त्तो अ॑स्तु॒ प्रय॑स्वान्यस्त॑ आदित्य॒ शिक्ष॑ति व्र॒तेन॑”-इत्यपि निगमो भवति [ऋ० सं० ३, ४, ५, २] अथापि वरुणस्य-एकस्य — “अथा वय मादित्य व्रते तव” [ऋ० सं० १, २, १५, ५] ‘व्रतम्’-इति कर्मनाम, ‘वृणोति’-इति सतः। इदमपि इतरत्-व्रतम्-एतस्मादेव, निवृत्तिकर्म, ‘वार- यति’-इति सतः। ‘अन्नम्’-अपि व्रतम्-उच्यते, यद् आवृणोति शरीरम् ॥ १ ॥ अर्थ । अन्तरिक्ष-नामोंके आगे दिव् और आदित्यके साधारण या साझेके छः (६) नाम हैं। किन्तु इस आदित्यके जो नाम प्रधान स्तुतिके भागी हैं, उनकी व्याख्या ऊपर या दैवतकाण्ड या सत्तर- हवें अध्याय (दै० का० ६, २, १—३, ६) में करेंगे। ‘आदित्य किस हेतुसे है?। रसोंका आदान या ग्रहण करता है। ज्योतियों या ग्रह-नक्षत्रोंकी दीप्तिको ले लेता है। अथवा भास् या प्रकाशसे आवरण किया हुआ है। अथवा अदितिका पुत्र है। इस अर्थका ‘आदित्य’ शब्द ऋग्वेदमें बहुत कम आता है। अदितिकी पुत्रताका बोधक ‘आदित्य’नाम प्रायः करके सूक्तमें देवताकी स्तुतिके लिये ही आता है, कदाचित् हविके विधायक वाक्यमें भी। [उदाहरण] “यद्दे- वेनमदधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम्” अर्थात्-‘जब ही यज्ञके योग्य देवताओंने इस आंग्र और अदितिके पुत्र सूर्यको द्युलो- कमें स्थापन किया।’ [ऐसे ही] अन्य देवताओंकी भी ‘आदित्य’ विशेषणसे स्तुति होती हैं। सो जैसे-यह-मित्रकी, वरुणकी, अर्य्यमाकी, दक्षकी, भगकी, अंशकी,। और भी मित्र और वरुण