निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १०७ नक्तं चारोणि-उपरमयति, इतराणि ध्रुवीकरोति । राते र्वा स्याद् दानकर्मणः । प्रदीयन्ते अस्याम् अवश्यायाः । उषोनामानि उत्तराणि षोडश । उषाः कस्माद् ? उच्छति इति सत्याः । रात्रे रपरः कालः । तस्या एषा भवति ॥ १ ॥ अर्थ । 'काष्ठा' यह अनेक द्रव्यका नाम होता है,-यहाँसे दिशाओंके प्रसंग ओर अनुप्रसंगकी बातें कही गईं, अब प्रकृतकी व्याख्या होती है— दिशाके नामोंसे आगे तेईस ( २३ ) रात्रिके नाम हैं । [ रात्रिमें तम या अँधेरा ही पदार्थ है, और वह दिशाओंमें ही अपनी स्थिति करता है, इससे दिङ्नामोंके अनन्तर रात्रिनाम कहे गये हैं । ] 'रात्रि' क्यों है ? जब यह भी आती है, तो नक्तंचरो ( रात्रिके विचरनेवालों ) को रमण कराती है। [ क्योंकि-वे दिनके बीत जाने पर, रात्रिके आते ही, अपने विहारका समय जान कर विशेष- रूपसे रमण करते हैं । और वही अन्य दिवाचारी मनुष्य आदि प्राणियोंका भी उपरमण कराती है, अर्थात् रात्रिके आजाने पर अपने अपने कार्योंसे निवृत्त होकर निवासके लिये स्थिर हो जाते हैं । अथवा दानार्थ 'रा' ( अदा० प० ) धातुसे है । [ क्योंकि-] उसमें अवश्यःय ( तुषार ) या ओस गिरती है। इन्हींका प्रदान करनेसे यह रात्रि हैं । क्योंकि-रात्रिका ही पिछला समय 'उषस्' ( उषा ) कहलाता है, इसीसे रात्रिनामोंके पश्चात् सोलह ( १६ ) 'उषा' के नाम हैं।