निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 284, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें११८ २ अ० ६ पा० ५ खं० । पृथिवीको तपन करते हैं। अर्थात् पर्जन्य (मेघ) वायु (पवन) और आदित्य (सूर्य) शीत (ढंढक) उष्ण (गरमी) और वर्ष (वृष्टि) से ओषधियोंको पकाते हैं । अनूप। क्योंकि-वे अपने अपने कर्मसे लोकोंको समयके अनुसार अनुगृहीत करते हैं। यह दूसरा भी (देश विशेषका वाचक) 'अनूप' शब्द इसी अनु (उप०) पूर्वक 'डुवप्' बीजसन्ताने (भ्वा० उ०) धातुसे है। क्योंकि वह भी जलसे भरा जाता है। अथवा अनु (उप०) 'आप्' (स्वा० प०) धातुसे 'अन्वाप्' शब्द होगा। क्योंकि वह जलसे व्याप्त होता है। जैसे 'प्राच्' शब्द। उसका अनूप'यह शब्द बन जायगा। जैसे 'प्राचीन' यह। [४र्थ पाद] दो पुरीष बूबूकको धारण करते हैं। दो वायु और आदित्य। 'बूबूक' जल। 'बूबूक' यह जलका नाम है। शब्दार्थक 'ब्रूञ्' (अदा० उ०) धातुसे है। अथवा 'भ्रंश' अधःपतने (भ्वा० आ०) धातुसे हैं। [क्योंकि-वह मेघसे गिरता है।] 'पुरीष' शब्द 'पृ' पूरणे (क्र्यादि प०) धातुसे है। [क्योंकि-वह जलाशयोंको पूर्ण कर देता है।] अथवा तृप्त्यर्थक 'पूर' (चु० उ०) धातुसे बनता है [क्योंकि-वह प्राणियोंकी तृप्ति करता है।] इति हिन्दी-निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥२,६॥ ──────────────