निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] हिन्दी निरुक्त। ११७
इतरः-'अनूपः' एतस्मादेव । अनूप्यते उदकेन । अपि वा 'अन्वाप्'-इति स्यात् यथा 'प्राक्' इति । तस्य 'अनूपः' इति स्यात् । यथा 'प्राचीनम्' इति । “द्वा ब्बूकं वहतः पुरीषम्” वाय्वादित्यौ उदकम् । 'ब्बूकम्' इति-उदकनाम । ब्रवीते र्वा शब्दकर्मणः । भ्रंशते र्वा । 'पुरीषं' पृणातेः, पूरयते र्वा ॥ ५ ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ २, ६ ॥ अर्थ । 'उपर' शब्दकी मेघवाचकतामें उदाहरण मन्त्र । उदाहरणमें आये हुए 'प्रथम' 'अनूप' 'ब्बूक' और 'पुरीष' शब्दका निर्वचन । “वसुक्रस्य इन्द्रपुत्रस्य इयमर्षम् । त्रिष्टुप् । महाव्रते मरुत्वतीये शस्यते ।” मन्त्रार्थ—प्रजापतिके द्वारा देवताओंके निर्माणमें मध्यम लोकके देवता ही प्रथम ( मुख्य ) हुए । [ क्योंकि-मेघके अभावमें वृष्टि नहीं हो सकती और वृष्टिके बिना जब जगत् नहीं रह सकता, इसीसे इन मध्यम देवताओंकी उत्कृष्टता है । ] इन मेघोंके कृन्तन कर्त्तन या छेदनसे उपर ( जल ) “उदायन्” आते हैं । तीन अनूप देवता पृथिवीको तपाते हैं । दो देवता पुरीष या तृप्तिके देनेवाले पुरीष ( जल ) को धारण करते हैं । भाष्यार्थ-[ १म पाद ] देवताओंके निर्माणमें माध्यमिक देवगण प्रथम स्थित हुए । प्रथम यह मुख्यका नाम है । [ क्योंकि ] वह प्रतम या प्रकृष्टतम ( उत्तम ) होता है । [ २य पाद्-] मेघोंके विकर्त्तन [ काटनेसे ] उदक ( जल ) होता है । [ ३य पाद् ] तीन अनूप