निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० २ अ० ६२ पा० ख० । “प्रकृत्यन्तः सनन्तश्च यङन्तो यङ्लुगेव च । रायन्तो रायन्तसनन्तश्च षड्विधो धातुरुच्यते ॥” अर्थ:—प्रकृत्यन्त, सनन्त, यङन्त, यङ्लुक्, रायन्त, और रायन्त सनन्त छः प्रकारका धातु होता है । ‘पथित्’ शब्द ‘पत्लृ’ पतने (भ्वा० प०), ‘पद’ गतौ (दि० आ०) और ‘पथि’ गतौ (चु० प०) धातुसे है । ‘अङ्क’ शब्द ‘अञ्चु’ गतिपूजनयोः (भ्वा० प०) धातुसे है । ‘अपनीफणत्’ यह क्रिया पद ‘फण’ गतौ (भ्वा० प०) यङ्लुगन्त धातुसे है । अश्वोंके नामोंके अनन्तर दश (१०) आदिष्टोपयोजन हैं ऐसा आचार्य कहते हैं । यद्यपि ये अश्वोंके ही नाम हैं, इससे इन्हें पूर्वोक्त अश्व नामोंके साथ मिला कर ही कहना चाहिये था, तथापि ये नाम विशेष विशेष देवताओंके सम्बन्धसे ही मन्त्रोंमें आते हैं, इस लिये उन देवताओंके साहचर्य या सम्बन्धके दिखानेके लिये अलग पढ़े गये हैं । आदिष्टोपयोजन नामोंके पश्चात् ‘ज्वलति’ (जलता है) के अर्थमे ग्यारह (११) धातु हैं । उतने ही उनके आगे ज्वलत् पर जलता हुआके नाम है ॥ ६ ॥ व्याख्या । ज्वलितकर्मा । क्योकि-जो ही अश्ववाले होते हैं, वे ही तेजसे जलते हुए जैसे होते हैं, इसीसे अश्वनामोंके अनन्तर ज्वलित अर्थ- वाले धातु कहे हैं ॥ ६ ॥ निरुक्तके द्वितीय-अध्यायका खण्डसूत्र—