भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

हिन्दी निरुक्त । १३६ वह 'वाजी' शत्रुओंको डरानेवाला गर्दनमे बाघीसे, छातीमे कक्ष्या या तङ्गसे और मुखमें खलीन या लगामसे बँधा हुआ होने पर भी घोड़ा कोड़ेके लगते ही, या लगनेसे पहिले ही शीघ्र मार्गको व्याप्त कर लेता है [ जब कि दूसरा प्राणी एक स्थानमें भी बँधा हुआ चल भो नहीं सकता, शीघ्र चलना तो कहाँ । ] अपने गमन- रूप कर्मको अथवा अपने सवारकी बुद्धिको विस्तृत [ क्योंकि- शीघ्र चलनेके कारण स्वामीके वाञ्छितको सिद्ध करता है । ] ओर मार्गकी जो कुटिलता या टेढ़ापन है, उसे अपनी शीघ्रगतिके प्रभावसे सरल करता हुआ बार बार या अति गमन करता है ॥ इस मन्त्रमें दधिक्राके वर्णनमे जो विशेषण दिये हैं, वे सब अश्वमें ही घटते है, इस लिये यह 'दधिक्रा' के अश्ववचनतामें प्रमाण है । वेदके समयमे जो घोड़ेकी तैयारीमें सभ्यता थी, वह अब तक भी उसी रूपमें है, कोई परिवर्त्तन नहीं हुआ है । वह वाजी वेजनवान् या भयवान् कोड़ेके साथ ही शीघ्र मार्गको व्याप्त करता है । ग्रीवामें बँधा हुआ । 'ग्रीवा' शब्द निगलने अर्थमें 'गृ' ( तु० प० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे अन्नको निगलता है । अथवा शब्द अर्थ में 'गृ' ( क्रया० प० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे शब्द करता है । अथवा ग्रहण अर्थमे 'ग्रह' ( क्रया० उ० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे जल आदिको ग्रहण करता है । अथवा वह जत्रोऽसे बाँधी जाती है । कक्ष ( छाती ) में और आसन् ( मुख ) में । 'आसन्' शब्दकी व्याख्या [ ] हो चुकी । “ऋतु' दधिक्राः” 'ऋतु' कर्म या प्रज्ञाको । 'दधिक्रा' अश्व । “अनु सन्तवीत्वत्” 'तनु' विस्तारे ( त० उ० ) धातुकी पहिली प्रकृतिके निगम है ।