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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त । १३६ वह 'वाजी' शत्रुओंको डरानेवाला गर्दनमे बाघीसे, छातीमे कक्ष्या या तङ्गसे और मुखमें खलीन या लगामसे बँधा हुआ होने पर भी घोड़ा कोड़ेके लगते ही, या लगनेसे पहिले ही शीघ्र मार्गको व्याप्त कर लेता है [ जब कि दूसरा प्राणी एक स्थानमें भी बँधा हुआ चल भो नहीं सकता, शीघ्र चलना तो कहाँ । ] अपने गमन- रूप कर्मको अथवा अपने सवारकी बुद्धिको विस्तृत [ क्योंकि- शीघ्र चलनेके कारण स्वामीके वाञ्छितको सिद्ध करता है । ] ओर मार्गकी जो कुटिलता या टेढ़ापन है, उसे अपनी शीघ्रगतिके प्रभावसे सरल करता हुआ बार बार या अति गमन करता है ॥ इस मन्त्रमें दधिक्राके वर्णनमे जो विशेषण दिये हैं, वे सब अश्वमें ही घटते है, इस लिये यह 'दधिक्रा' के अश्ववचनतामें प्रमाण है । वेदके समयमे जो घोड़ेकी तैयारीमें सभ्यता थी, वह अब तक भी उसी रूपमें है, कोई परिवर्त्तन नहीं हुआ है । वह वाजी वेजनवान् या भयवान् कोड़ेके साथ ही शीघ्र मार्गको व्याप्त करता है । ग्रीवामें बँधा हुआ । 'ग्रीवा' शब्द निगलने अर्थमें 'गृ' ( तु० प० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे अन्नको निगलता है । अथवा शब्द अर्थ में 'गृ' ( क्रया० प० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे शब्द करता है । अथवा ग्रहण अर्थमे 'ग्रह' ( क्रया० उ० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे जल आदिको ग्रहण करता है । अथवा वह जत्रोऽसे बाँधी जाती है । कक्ष ( छाती ) में और आसन् ( मुख ) में । 'आसन्' शब्दकी व्याख्या [ ] हो चुकी । “ऋतु' दधिक्राः” 'ऋतु' कर्म या प्रज्ञाको । 'दधिक्रा' अश्व । “अनु सन्तवीत्वत्” 'तनु' विस्तारे ( त० उ० ) धातुकी पहिली प्रकृतिके निगम है ।

१४० २ अ० ६२ पा० ख० । “प्रकृत्यन्तः सनन्तश्च यङन्तो यङ्लुगेव च । रायन्तो रायन्तसनन्तश्च षड्विधो धातुरुच्यते ॥” अर्थ:—प्रकृत्यन्त, सनन्त, यङन्त, यङ्लुक्, रायन्त, और रायन्त सनन्त छः प्रकारका धातु होता है । ‘पथित्’ शब्द ‘पत्लृ’ पतने (भ्वा० प०), ‘पद’ गतौ (दि० आ०) और ‘पथि’ गतौ (चु० प०) धातुसे है । ‘अङ्क’ शब्द ‘अञ्चु’ गतिपूजनयोः (भ्वा० प०) धातुसे है । ‘अपनीफणत्’ यह क्रिया पद ‘फण’ गतौ (भ्वा० प०) यङ्लुगन्त धातुसे है । अश्वोंके नामोंके अनन्तर दश (१०) आदिष्टोपयोजन हैं ऐसा आचार्य कहते हैं । यद्यपि ये अश्वोंके ही नाम हैं, इससे इन्हें पूर्वोक्त अश्व नामोंके साथ मिला कर ही कहना चाहिये था, तथापि ये नाम विशेष विशेष देवताओंके सम्बन्धसे ही मन्त्रोंमें आते हैं, इस लिये उन देवताओंके साहचर्य या सम्बन्धके दिखानेके लिये अलग पढ़े गये हैं । आदिष्टोपयोजन नामोंके पश्चात् ‘ज्वलति’ (जलता है) के अर्थमे ग्यारह (११) धातु हैं । उतने ही उनके आगे ज्वलत् पर जलता हुआके नाम है ॥ ६ ॥ व्याख्या । ज्वलितकर्मा । क्योकि-जो ही अश्ववाले होते हैं, वे ही तेजसे जलते हुए जैसे होते हैं, इसीसे अश्वनामोंके अनन्तर ज्वलित अर्थ- वाले धातु कहे हैं ॥ ६ ॥ निरुक्तके द्वितीय-अध्यायका खण्डसूत्र—

हिन्दी निरुक्त । १४१ [ १म पाद् ] ' अथ निर्वचनम् (अर्थाप्यस्तैः ) (१) ओघः (शवभिः) (कक्ष्या-सामान्यादश्वस्य) (विष्व- कद्राकर्षः ) ( २ ) राज्ञः ( ३ ) विद्याह वै ( ४ ) [ द्वि० पा० ] अथातोऽनुक्रमिष्यामः ( ५ ) वृक्षे वृक्षे ( ६ ) ता वां वास्तूनि ( ७ ) य ईं चकार ( ८ ) अयं स शिङ्क्ते ( ८ ) [ तृ० पा० ] हिरण्यनामानि ( १० ) आर्ष्टिषेणः ( ११ ) [४र्थ पा०] यद्देवापिः (१२) साधारणानि ( १३ ) स्वरादित्यः (१४ ) [ ५म पा० ] रश्मिनामानि ( १५ ) अतिष्ठन्तीनां ( १६ ) दासपत्नीः ( १७ ) [ ६ष्ठ पा० ] रात्रिनामानि ( १८ ) इदं श्रेष्ठं ( १८ ) रुशद्वत्सा ( २० ) अहश्च कृष्णम् ( २१ ) देवानां माने ( २२ ) [ ७म पा०] वाङ्नामानि ( २३ ) इयं शुष्मेभिः ( २४ ) रमध्वं मे ( २५ ) इन्द्रो अ- स्मान् ( २६ ) आ ते कारो ( २७ ) उतस्यः ( २८ ) अष्टाविंशतिः ( २८ ) ॥ इति निरुक्ते पूर्वषट्के द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २, ७॥

१४२ २ अ० ७ पा० ६ खं० । ऊपर दिये हुए खण्डसूत्रके अनुसार इस द्वितीय अध्यायमें आरम्भसे अन्त तक निरुक्तके पाठमें खण्ड आये हैं। उन्हींके स्मरणार्थ यह खण्डसूत्र है। जहां आदर्श पुस्तकमें एक खण्डमें दो खण्ड या अन्यथा किया गया है, वहां मूल खण्ड प्रतीकके साथ द्वयर्धचन्द्र-( ) चिन्हके भीतर नवीन पाठ-विभाग दे दिया गया है। पादोंका आरम्भ और खण्डोंकी संख्या भी यथास्थान उक्त चिन्हमें दी गई है। इति हिन्दीनिरुक्ते पूर्वषट्के द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २, ७ ॥

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॥ श्रीः ॥ हिन्दी-निरुक्त । अथ तृतीयाध्याय । ( १ म पादः ) अथ निघण्टौ द्वितीयोऽध्यायः १ [ निघ० ] अपः ( १ ) । अप्नः ( २ ) । दंसः ( ३ ) । वेषः ( ४ ) । वेपः ( ५ ) । विष्ट्वी ( ६ ) । ब्रतम् ( ७ ) । कर्वरम् ( ८ ) । शक्म ( ९ ) । क्रतु ( १० ) । करणम् ( ११ ) । करणानि ( १२ ) । करांसि ( १३ ) । करन्ती ( १४ ) । करिक्रत् ( १५ । चक्रत् ( १६ ) । कर्त्वस् ( १७ ) । कर्त्तोः ( १८ ) । कर्त्तवैः ( १८ ) । कृत्वी ( २० ) । धीः ( २१ ) । शची ( २२ ) । शमी ( २३ ) । शिमी ( २३ ) । शक्तिः ( २५ ) । शिल्पम् ( २६ ) । इति षड्विंशतिः कर्म नामानि ॥ १ ॥ [ निघ० ] तुक् ( १ ) । तोकम् ( २ ) । तनयः ( ३ ) । तोक्म ( ४ ) । तक्म ( ५ ) । शेषः ( ६ ) ।

२ ३ अ० १ पा० १ खंड । अप्नः (७)। गयः (८)। जाः (८)। अपत्यम् (१०)। यहुः (११)। सूनुः (१२)। नपात् (१३)। प्रजा (१४) बीजम् (१५)]। इति पञ्चदश अपत्य नामानि ॥ २ ॥ (खण्ड १) [निरुक्तम्] ओ३म् । कर्मनामानि उत्तराणि षड्विंशतिः। कर्म कस्मात् ? क्रियते-इति सतः। अपत्यनामानि उत्तराणि पञ्चदश। अपत्यं कस्मात् ? अपततं भवति। न अनेन पतति इति वा। तद्-यथा जनयितुः प्रजा-एवमर्थीये ऋचा उदाहरिष्यामः ॥ १ ॥ अर्थ। ज्वलत्के नामोंके पीछे छब्बीस (२६) कर्मके नाम हैं। [क्योंकि कर्मोंको करता हुआ ही तेजसे जलता है अथवा चमकता है, इसीसे ज्वलत्के नामोंके पश्चात् कर्म कहे गये हैं।] 'कर्म' शब्द किस धातुसे है? 'क्रियते' किया जाता है ऐसे कर्मवाच्य 'कृञ्' (त० उ०) धातुसे है। प्रकृत कर्म नामोंके पीछे पन्द्रह (१५) अपत्यके नाम हैं। [क्योंकि सब कर्मों में पितृऋणके दूर करनेके द्वारा अपत्य या सन्तानका उत्पन्न करना ही प्रधान कर्म है, इससे, कर्मनामोंके पश्चात् अपत्य-नाम कहे गये हैं।]

हिन्दी निरुक्त । ३ 'अपत्य' क्यों है ? अप-तत अर्थात् पितासे आकर अलग जैसा विस्तृत होता है। अथवा इसके उत्पन्न हुए हुए होनेसे पितर नरकमे नहीं गिरते हैं [ इससे अपत्य है । ] [ धर्मके जाननेवाले पुरुष विवाद करते हैं कि दोनोंके सन्निपात या उपस्थितिमें क्या क्षेत्रवालेका अपत्य है या बीज वालेका ? सो यह कहा जाता है कि ] 'जिस प्रकार उत्पन्न-करनेवाले या बीजवालेका ही अपत्य या प्रजा है इस प्रकारकी व्यवस्थामें दो ऋचाए उदाहरण करते हैं । ( खण्ड २ ) “परिषद्यं ह्यररणस्य रेक्णो नित्यस्त एयः पतयः स्याम। न शेषो अग्ने अन्यजात मस्त्यचेतानस्य मा पथो विदुक्षः ॥” [ ऋ० सं० ५, २, ६, २ ] [ भा० ] परिहर्त्तव्यम् हि न उपसत्तव्यम्, अरणस्य रेक्णाः । अरणः, अपार्णो भवति । 'रेक्णः, इति धननाम । रिच्यते प्रयतः । नित्यस्यरायः पतयः स्याम ।” पित्र्यस्य इव धनस्य । “न शेषो अग्ने अन्यजात मस्तिः ।” 'शेषः' इति अपत्यनाम । शिष्यते प्रयतः । अचेतयमानस्य तत् प्रमत्तस्य भवति । “मा” नः “पथो” “वि” दुदुषः-इति । तस्य उत्तरो भूयसे निर्वचनाय ॥ २ ॥

४ ३ अ० १ पा० २ खं० । अर्थ । “परिषद्यं हि” न हि ग्रभाय “इति च ( २, ३ खं० ) एते त्रिष्टुभौ ।” वसिष्ठ और अग्निके संवादमे हतपुत्र वसिष्ठने अग्निसे प्रार्थना की कि 'मुझे पुत्र दे' । अग्निने वसिष्ठसे कहा कि-क्रीतक (खरीदा हुआ) कृत्रिम (बनावटी) और दत्तक (गोदका) आदि पुत्र बहुत हैं, उनमेंसे कोई पुत्र कर सकते हो । इस प्रकार अग्निसे उत्तर पाकर वसिष्ठने दो ऋचाओंसे (अन्यजात (औरसे उत्पन्न) पुत्रोंकी निन्दा करते हुए औरस (जो अपने वीर्यसे अपनी पत्नीमें उत्पन्न होता है) पुत्र माँगा । 'हि' यतः 'अरणस्य' अपगतोदकसम्बन्धस्य पर- कुलजातस्य 'रिक्थः' यद्-अपत्याख्यं धनम् तत्- 'परिषद्यम्' परिहर्त्तव्यम् न पुत्रत्वेन परिकल्पयित- व्यमित्यर्थः । यतः एवम् अतो ब्रूमः-'नित्यस्य' 'रायः' अपत्याख्यस्य धनस्य 'पतयः' स्वामिनः 'स्याम' भवेम । हे 'अग्ने ।' 'न' 'शेषः' अपत्यम् 'अन्य- जातम्-अस्ति' । 'अचेतांस्य' धर्मान् अश्रु तवत एव तद् भवति । तस्मात् 'पथः' सन्मार्गात् अस्मान् मा कथञ्चित् 'विदुक्षः' विदूदूषः प्रच्योवय इत्यर्थः । त्वं देहि नः पुत्रम्-औरसम्-इत्यभिप्रायः । जिससे कि-उसका अपत्य (पुत्र) रूप धन जिसके साथ अपना जलका सम्बन्ध नहीं अर्थात् दूसरे कुलमें पैदा हुआ है,

त्याज्य या पुत्र-भावसे मानने योग्य नहीं हैं। इस कारण कहते हैं कि-इस नित्य (जो सदा हमारे सङ्ग रहे) पुत्ररूप धनके पति या स्वामी होवें। हे अग्नि देव ! दूसरेसे उत्पन्न हुआ अपत्य नहीं होता। अर्थात् जो ही उसे उत्पन्न करता है, उसीका वह होता किन्तु दूसरेका नहीं। अनजानको ही वह सन्तोष मात्र है, कि- यह मेरा अपत्य है पर वास्तवमे वह अपत्यका काम नहीं देता। अतः हम कहते हैं कि-हमें हमारे बाप दादोंकी मर्यादासे मत गिराओ। प्रयोजन यह कि-हमें औरस पुत्र दो। [ निरुक्तार्थ ] [ १ म पा० ] क्योंकि अरण या जलके सम्बन्धसे रहित पुरुषका रेक्ण या अपत्यधन छोड़ने योग्य है,या पास जाने योग्य नहीं है। 'अरण' नाम अपार्णका है, अर्थात् जिसके साथ जलका सम्बन्ध नहीं। 'रेक्ण' नाम धनका है। क्योंकि वह इस लोकसे परलोकको जाते हुए या मरते हुएका यहीं रह जाता है, या उससे वह खाली हो जाता है। [ द्वि० पा० ] हम 'नित्य' जो अपने संगको कभी न छोड़े, धनके पति होवें। जैसे कि बापके धनका स्वामी बेटा हो जाता है। [ तृ० पा० ] हे अग्निदेव ! दूसरेसे उत्पन्न हुआ 'शेष' नहीं है। 'शेष' यह नाम अपत्यका है। क्योंकि मरते हुएका वह शेष (बचा हुआ) रह जाता है। [ च० पा० ] 'अचेतयमान' या प्रमादीका वह होता है। हमें उस मार्गसे मत अलग करो। इसी अपत्य शब्दके निर्वचनके प्रसङ्गमें इस मन्त्रकी व्याख्या की गयी है, और आगेका मन्त्र प्रसक्तानुप्रसक्त ही कहा गया है, इसी अभिप्रायसे आचार्य कहते हैं—"तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय।" अर्थात् उसी मन्त्रकी पर्याप्त (काफी) व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥२॥

६ ३ अ० १ पा० २ खं० । व्याख्या। यद्यपि “परिषद्यं हि” यह ऋचा ‘अपत्य’ शब्दके निर्वचनमें किसी अर्थको पुष्ट नहीं करती, इससे इसे यहां न पढ़ना चाहिये था। [ व्याकरणके समान निरुक्तमें भी शब्दोंका ही अनुशासन है, अतः शब्द ही उसके विषय हैं, उनके व्याख्यानमें उनके अर्थको पुष्ट करनेके लिये जो मन्त्र रखा जाता है वह वहाँ निगम नामसे बोला जाता है और आवश्यक होता है, किन्तु यह ऋचा उस कार्यको नहीं करती । ] तथापि ‘अपत्य शब्दके अर्थ अपत्य या पुत्रके सम्बन्धकी एक ऐसी मार्मिक बातको यह ऋचा कहती है, जो अपुत्र मनुष्य पुत्रकी लालसा रूप अग्निको बुझानेके अर्थ दत्तक- कृत्रिम आदि पुत्र करते हैं, उन्हें याद रखने और विद्वानोंको हृदयङ्गम करने योग्य है, ऐसा जान कर आचार्यने इसे यहाँ रख दिया है। इसके अतिरिक्त यह भी इस ऋचाके द्वारा आचार्यने दिखाया कि, जिस प्रकार स्मृतियोंमें धर्मके अनेक रहस्य विस्तारसे दिखाये हैं, उसी प्रकार वेदमें भी वैसे ही रहस्य विस्तार पूर्वक हैं। वसिष्ठजी इस मन्त्रमें अपने देवतासे दो प्रार्थनाएं (दरखास्तें) करते हैं (क) हम नित्य (अपत्य) धनके पति हों। (ख) हमे सच्चे मार्गसे भुलावा न दें। इन प्रार्थनाओंके ठहरानेमें तीन कारण दिखाये हैं (क) असम्बन्धीका (अपत्य) धन परित्याज्य है (ख) हे अग्ने ! अन्यजात अपत्य (पुत्र) नहीं होता। (ग) किन्तु वह अचेतान (अनजान) को होता है। अरण या अपगतोदक-सम्बन्ध ।— “सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते । समानोदक-भावस्तु जन्मनाम्नो खेदने ॥” [ मनु० ५, ६० ]

हिन्दी निरुक्त । ७ अर्थात्-सातवें पुरुष या पीढ़ीमे सापिण्ड्य पूरा हो जाता है, और 'हमारे कुलमे अमुक नामका पुरुष हुआ'- इस प्रकार जन्म और नामके परिज्ञान न रहनेसे समानका सम्बन्ध छूट जाता है ॥ २ ॥ (खण्ड ३) [ निरु० ] “न हि ग्रभायारणः सुशेवोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ । ऊधा चिदोकः पुनरित्स एत्यानो वाज्यभीषाले तु नव्यः ॥” [ ऋ० सं० ५, २, ६, ३ ] 'न हि' ग्रहीतव्यः 'अरणः' सुसुखतमोऽपि । 'अन्योदर्यो मनसाऽपि न मन्तव्यो-मम-अयम्-पुत्रः- इति । अथ 'सः' 'ओकः' 'पुनः' एव तद् 'एति' यतः आगतो भवति । 'ओकः' इति निवास नाम उच्यते । 'एतु' 'नो' 'वाजी' वेजनवान् अभिषह माणः सपत्नान् नवजातः स एव पुत्रः इति । अथ एतां दुहितृदायाद्ये उदाहरन्ति पुत्र- दायाद्ये-इत्येके ॥-॥ ३ ॥ अर्थ । [ सं० मन्त्रार्थः ] “सुशेवः” 'सुसुखतमः' परि- चारकः हितैषी अपि “अरणः” अपगतोदकसम्बन्धः पुत्रः “नहि ग्रभाय” 'नहि ग्रहीतव्यः' “अन्योदर्यो मनसा” 'अपि' “न” “मन्तवै ( उ )” 'मन्तव्यः'।

८ ३ अ० १ पा० ३ खं० । “अधः” अथ अतः “सः” तद् “ओकः” स्वं निवास स्थानं स्वं वंशं वा “पुनः-इत्” ‘पुनरेव’ “एति” ‘आगतो भवति’ । यतः एवम्-अतो ब्रवीमि ‘स एव’ “नव्यः” ‘नवजातः पुत्रः’ य “वाजी” ‘वेजनवान्’ परेभ्यो भयदाता “अभीषाट्” अभि- षहमाणः’ अभिभवन् सपत्नान् “नः” अस्माकम् “ऐतु” आगच्छतु न परकीयः पुत्रः सङ्कल्पितः इत्यर्थः । चाहे बहुत सुखका देनेवाला, सेवा करनेवाला और हितका चाहनेवाला भी क्यों न हो, परन्तु जिसके साथ जलका सम्बन्ध न हो उसे पुत्र कभी न बनाना चाहिये; तथा “अन्योदर्य” दूसरेके डाले हुए वीर्य्यसे उत्पन्न हुआ या दूसरेकी पत्नीके पेटसे उत्पन्न हुआ मनसे भी सङ्कल्प न करना चाहिये कि-यह मेरा पुत्र है । क्योंकि फिर भी वह अपने उस पुराने घर या वंशमे आ जाता है । जिससे कि-ऐसा है, इससे मैं कहता हूं कि-वह नव्य नवजात (नया पैदा हुआ) पुत्र जो शत्रुअ का भय देनेवाला और उन्हे तिरस्कार करने वाला हमें पुत्र मिले, अर्थात् दूसरेका पुत्र हमारा सङ्कल्पित या वाञ्छित नहीं है । (नि० अ० ) नहीं ही लेना चाहिये, जिसके साथ जलका सम्बन्ध नहीं, चाहे बहुत सुखदायी भी हो । दूसरेके पेटसे उत्पन्न हुआ (पुत्र) मनसे भी न मानना चाहिये कि-यह मेरा है। क्योंकि वह उस स्थानको फिर भी आ जाता है, जहाँसे वह आया हुआ होता है। ‘ओकस्’ यह निवासका नाम कहा जाता है। मिले

हिन्दी निरुक्त । ε हमें शत्रुओंको डरानेवाला और तिरस्कार करनेवा ला वही नवीन पैदा हुआ पुत्र । अब उस ऋचाको कन्याके दायभागित्वमे उदाहरण देते हैं और कोई पुत्रके दायभागित्वमें ॥ ३ ॥ व्याख्या । पहिली ऋचामें अरणका पुत्र त्याज्य बतलाया है और इस ऋचामे स्वयम् अरण ही त्याज्य पुत्र कहा है किन्तु दोनोंका अभिप्राय एक ही है। क्योंकि अरणका पुत्र भी अरण ही होगा। इसी प्रकार पूर्व ऋचामें अन्य जातकी पुत्रताका निषेध है, और इस ऋचामे अन्योदर्यका निषेध है। इन दोनोंका भी परिणाम एक ही अर्थमें होता है। क्योंकि अन्य का जात तभी हो सकता है, जब कि वह दूसरेके क्षेत्रमे बीज बोता है। ओर अन्यका उदर भी वही है जो बोनेवालेकी स्त्रीका उदर नहीं है। अन्यजात अन्योदर्य तथा अरण पुत्रका निषेध दोनों मन्त्रोंमें एककी अपेक्षा एक बहुत ही बलपूर्वक करता है। एक कहता है कि- अन्यजात पुत्र ही नहीं है, और दूसरा कहता है कि अन्योदर्य- को मनसे भी नहीं सोचना। केवल पूर्वमन्त्रसे इस मन्त्रमें नयी बात यह कही है कि—अन्यजात पुत्र फिर भी समय पाने पर अपने पुराने ठिकाने ही चला जाता है। जो अभिमान मनुष्यको अपने गर्भाधान करनेवालेसे होता है, दूसरेसे कभी नहीं होता। यह मन्त्रकी मर्मोक्ति है। इसके अतिरिक्त यह भी है कि-चाहे वह सेवा आदि गुणोंसे युक्त हो तो भी उसे नहीं लेना। इसमें प्रकृति- की महिमाकी दुस्तरता दिखाई है। क्योंकि-उसे गुणवान्‌को मोहित करनेमे भी कोई परहेज नहीं है। २

१० ३ अ० १ पा० ४ खं० । इस मन्त्रके चतुर्थ पादमें यह भी सूचित किया कि—जो अपना औरस-पुत्र होता है, उसे ही अपने बाप दादोंके बैर भँजानेका आग्रह होता है तथा उसीसे बापकी इच्छा पूरी होती है। इस विचारे पुराने वेदने तो कितने ही बलके साथ अन्यजात या अन्योदर्य पुत्रकी निन्दा की, पर नये वेदको जो एक स्त्रीको ग्यारह पतियोंकी पत्नी बनाता है इसकी क्या परवाह होगी ? उसके हिसाबमे तो अन्य पत्नीका अपनी पत्नी होना कोई बड़ी बात ही नहीं है ॥ ३ ॥ • ( खण्ड ४ ) [ निरु० ] “शासद्वह्नि र्दुहितु र्नप्त्यङ्गाद्विद्वाँ ऋतस्य दीधितं सपर्यन् । पिता यत्र दुहितुः सेक- मृञ्जन् संशग्म्येन मनसा दधन्वे ॥” [ ऋ० सं० ३, २, ५, १ ] प्रशास्ति वोल्हा सन्तान कर्मणे 'दुहितुः' पुत्र- भावम् । 'दुहिता' दुर्हिता दूरे हिता । दोग्धेर्वा । नप्तारमुपागमद् दौहित्रिं पौत्रमिति विद्वान् प्रजनन- यज्ञस्य रेतसो वा । अङ्गादङ्गात्सम्भूतस्य हृदयादधि जातस्य मातरि प्रत्यृतस्य विधानं पूजयन्-अवि- शेषेण मिथुनाः पुत्राः दायादाः इति । तदेतद्-ऋक् श्लोकाभ्यामुक्तम् :—

हिन्दी निरुक्त । ११ “अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधि जायसे। आत्मा वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्” इति । [ गो० गृ० सू० २, ८, २१ ] “अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः । मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ‘न दुहितरः’ इत्येके । तस्मात् ‘पुमान् दाया- दोऽदायादा स्त्री’-इति विज्ञायते । तस्मात् स्त्रियं जातां परास्यन्ति न पुमांसम्-इति च । स्त्रीणां दान विक्रयातिसर्गा विद्यन्ते न पुंसः । ‘पुंसोऽपि’ इत्येके । शौनः शेपे दर्शनात् । ‘अभ्रातृमती वादः’- इत्यपरम् । ( असूर्या यन्ति जामयः सर्वा लोहित- वाससः । ) अभ्रातर इव योषास्तिष्ठन्ति हतवर्त्मानः अभ्रातृका इव योषास्तिष्ठन्ति सन्तान कर्मणे पिण्ड दानाय हतवर्त्मानः इति । अभ्रातृकाया अनिर्वाहः औपमिकः । तस्य-उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ४ ॥ अर्थः । “शासद्वह्नि” रिति एषा त्रिष्टुप् । ऐन्द्रं सूक्तं वैश्वामित्रम् । माध्यन्दिने सवने उक्थ पर्याये

१२ ३ अ० १ पा० ४ खं० । अच्छावाकस्य यच्छस्त्रम्-अभिजित्द्विश्वजिदादिषु अहीनकेषु अहः सु अहीनसूक्तं नाम तत्रेयं शस्यते । “न जामये तान्व” ( ६ खं० ) इति द्वयमपि अनयैव समानार्ष विनियोग दैवतच्छन्दस्का । ( मन्त्रार्थः ) “वह्नि” 'वोढा' उद्बोढा स्त्रियाः 'सन्तानकर्मणे' अर्थाय"दुहितुः” या स्वस्यां भार्यायां जायते पुत्री तस्याः 'पुत्रभावं' 'इवमेव मे पुत्रः' इति भावं “शासत्” 'प्रशास्ति' प्रख्यापयति प्रज्ञा- पयति इत्यर्थः । कथं पुनर्जायते प्रशास्ति-इति ? । उच्यते-इतः । यस्मात् “नप्ताङ्गात्” 'नप्तारमुपागमत्' उपागच्छति चेतसा, दौहित्रं पौत्रमिति । कीदृशः ? “ऋतस्य” 'प्रजननयज्ञस्य' 'रेतसो वा “विद्वान्” अभिज्ञः किं कुर्वन् ? “दीधितिं”'विधानं'“सपर्यन्” अविशेषेण पुत्रदुहित्रोर्गर्भाधानेतिकर्त्तव्यतां पूजयन् सञ्जानन्नित्यर्थः । “पिता” ‘यत्र” यस्मिन् काले “दुहितुः” ‘अप्रत्तायाः’ प्रदानात्-प्राक्-इत्यर्थः “सेकं” 'रेतः सेकं' जामातरम् “ऋञ्जन्” 'प्रार्जयति' प्रकल्पयति तदा तस्मै दुहितरं ददत् “संशग्म्येन” संगमेन विगतापुत्रत्वसन्तापेन “मनसा” चेतसा

हिन्दी निरुक्त । १३

“दधचे” ‘आत्मानं सन्दधाति’ यदत्र पुत्रिकायाम् अपत्यमुत्पत्स्यते तन्मम’ इति सन्धारयति इत्यर्थः । स्त्रीका पति जो उसका ब्याहने वाला है, उसमें होनेवाली पुत्रीमें सन्तान कर्मके अर्थ पुत्रभावको मानता है, या प्रसिद्ध करता है । [ अर्थात् ] मनसे इस बातको पक्की कर लेता है कि—इस होनेवाली पुत्रीमें जो पुत्र होगा ( दौहित्र ) वह मेरा पौत्र ( पोता ) होगा । [ क्योंकि ] वह गर्भाधान यज्ञ अथवा वीर्यके सम्बन्धको जाननेवाला तथा विधानका माननेवाला है । प्रयोजन यह कि—जिस मन्त्र और जिस विधानसे पुत्रके उत्पन्न करनेमें वीर्यका स्थापन होता है, उसीसे पुत्रीके उत्पन्न करनेमें भी । [ उत्तरार्द्ध ] जिस कालमें कन्याके दानसे पहिले वरको जामाता ( जँवाई ) बनाता है, उस समय उसे कन्या देता हुआ अपुत्रताके सन्तापसे रहित मनसे यह धारणा दृढ़ कर लेता है कि—इस कन्यामें जो पुत्र होगा वह मेरा होगा । ( निरुक्तार्थ ) ब्याहनेवाला पति सन्तानके अर्थ अपनी स्त्रीमें उत्पन्न होनेवाली दुहिता ( कन्या ) में पुत्रभावको मान लेता है । ‘दुहिता’ नाम दुर्हिताका है, अर्थात् जो दूर रहती हुई भी पिताके लिये हित-शुभ चाहनेवाली होती है । ‘अथवा’ ‘दुह’ प्रपूरणे ( अदा० उ० ) धातुसे है । क्योंकि—वह प्रार्थना स्वभाव होनेके कारण नित्य ही पितासे धनको दोहती रहती है । दौहित्रको नप्ति या पौत्र मानता है । गर्भाधानके यज्ञ अथवा वीर्यको जानने- वाला है । अङ्ग अङ्ग ( सब अङ्गों ) से, हृदयके अनुस्मरणसे उत्पन्न एवम् माताके प्रति गये हुए वीर्यके विधान को आदर करता हुआ, ‘समानतासे कन्या और पुत्र दोनो दायाद या धनके उत्तराधिकारी हैं'—मानता है । सो यह दो ऋचा-श्लोकों से कहा गया है—

१४ ३ अ० १ पा० ४ खं० । "अङ्गादङ्गाद्" इस ऋचाको बाप परदेशसे आकर पुत्रके मस्तक- में पढ कर सूंघता है। यह अनुष्टुप् छन्द है। पुत्रसे कहता है—'हे पुत्र ! तू मेरे अङ्ग अङ्गसे हुआ है। और तू मेरे हृदयसे हुआ है। तू पुत्रके नामसे मेरा आत्मा ही है। सो तू सौ वर्ष जी ।" "स्त्री और पुरुषरूप जो पुत्र उनका धर्मके अनुसार समानतासे दाय होता है। यह स्वयम्भूके पुत्र मनुने सृष्टिके आरम्भमें कहा है।" कोई धर्मवेत्ता कहते हैं कि—"कन्याएँ दायभागिनी नहीं होतीं।" "इससे पुरुष दाय (पैतृक-सम्पत्ति) का भागी होता है, स्त्री 'अदायादा' दायकी अधिकारिणी नहीं होती" यह इस ब्राह्मणके विचारसे प्रतीत होता है। [दूसरा ब्राह्मण] ["क्योंकि हवन कर्मसे स्थालीको अलग कर देते हैं, फिर उससे होम नहीं करते" काष्ठके पात्रको अलग नहीं करते फिर उसीसे होम करते हैं"] "इससे उत्पन्न हुई हुई स्त्री (कन्या) को अलग कर देते हैं या दूसरेको दे डालते हैं, किन्तु पुरुषको नहीं" ["इससे पुरुष ही बापके धनका स्वामी बनता है, कन्या नहीं"] और स्त्रियोंके दान, विक्रय (बेचना) और अतिसर्ग (त्याग) हैं, पुरुषके नहीं। क्योंकि वह दूसरेको दे दी जाती है, और वैवाहिक शुल्कसे बेच दी जाती है। जैसा कि—सुभद्राहरणमें भगवान् कृष्णने कहा है:— "विक्रयश्चाप्य पत्यस्य मतिमान् को न मंस्यते । स्वल्पो वाथ बहुर्वाऽपि विक्रयस्तावदेव सः ॥" (महाभारत)