भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 319

१० ३ अ० १ पा० ४ खं० । इस मन्त्रके चतुर्थ पादमें यह भी सूचित किया कि—जो अपना औरस-पुत्र होता है, उसे ही अपने बाप दादोंके बैर भँजानेका आग्रह होता है तथा उसीसे बापकी इच्छा पूरी होती है। इस विचारे पुराने वेदने तो कितने ही बलके साथ अन्यजात या अन्योदर्य पुत्रकी निन्दा की, पर नये वेदको जो एक स्त्रीको ग्यारह पतियोंकी पत्नी बनाता है इसकी क्या परवाह होगी ? उसके हिसाबमे तो अन्य पत्नीका अपनी पत्नी होना कोई बड़ी बात ही नहीं है ॥ ३ ॥ • ( खण्ड ४ ) [ निरु० ] “शासद्वह्नि र्दुहितु र्नप्त्यङ्गाद्विद्वाँ ऋतस्य दीधितं सपर्यन् । पिता यत्र दुहितुः सेक- मृञ्जन् संशग्म्येन मनसा दधन्वे ॥” [ ऋ० सं० ३, २, ५, १ ] प्रशास्ति वोल्हा सन्तान कर्मणे 'दुहितुः' पुत्र- भावम् । 'दुहिता' दुर्हिता दूरे हिता । दोग्धेर्वा । नप्तारमुपागमद् दौहित्रिं पौत्रमिति विद्वान् प्रजनन- यज्ञस्य रेतसो वा । अङ्गादङ्गात्सम्भूतस्य हृदयादधि जातस्य मातरि प्रत्यृतस्य विधानं पूजयन्-अवि- शेषेण मिथुनाः पुत्राः दायादाः इति । तदेतद्-ऋक् श्लोकाभ्यामुक्तम् :—