भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

हिन्दी निरुक्त । ε हमें शत्रुओंको डरानेवाला और तिरस्कार करनेवा ला वही नवीन पैदा हुआ पुत्र । अब उस ऋचाको कन्याके दायभागित्वमे उदाहरण देते हैं और कोई पुत्रके दायभागित्वमें ॥ ३ ॥ व्याख्या । पहिली ऋचामें अरणका पुत्र त्याज्य बतलाया है और इस ऋचामे स्वयम् अरण ही त्याज्य पुत्र कहा है किन्तु दोनोंका अभिप्राय एक ही है। क्योंकि अरणका पुत्र भी अरण ही होगा। इसी प्रकार पूर्व ऋचामें अन्य जातकी पुत्रताका निषेध है, और इस ऋचामे अन्योदर्यका निषेध है। इन दोनोंका भी परिणाम एक ही अर्थमें होता है। क्योंकि अन्य का जात तभी हो सकता है, जब कि वह दूसरेके क्षेत्रमे बीज बोता है। ओर अन्यका उदर भी वही है जो बोनेवालेकी स्त्रीका उदर नहीं है। अन्यजात अन्योदर्य तथा अरण पुत्रका निषेध दोनों मन्त्रोंमें एककी अपेक्षा एक बहुत ही बलपूर्वक करता है। एक कहता है कि- अन्यजात पुत्र ही नहीं है, और दूसरा कहता है कि अन्योदर्य- को मनसे भी नहीं सोचना। केवल पूर्वमन्त्रसे इस मन्त्रमें नयी बात यह कही है कि—अन्यजात पुत्र फिर भी समय पाने पर अपने पुराने ठिकाने ही चला जाता है। जो अभिमान मनुष्यको अपने गर्भाधान करनेवालेसे होता है, दूसरेसे कभी नहीं होता। यह मन्त्रकी मर्मोक्ति है। इसके अतिरिक्त यह भी है कि-चाहे वह सेवा आदि गुणोंसे युक्त हो तो भी उसे नहीं लेना। इसमें प्रकृति- की महिमाकी दुस्तरता दिखाई है। क्योंकि-उसे गुणवान्‌को मोहित करनेमे भी कोई परहेज नहीं है। २