निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ ३ अ० १ पा० ३ खं० । “अधः” अथ अतः “सः” तद् “ओकः” स्वं निवास स्थानं स्वं वंशं वा “पुनः-इत्” ‘पुनरेव’ “एति” ‘आगतो भवति’ । यतः एवम्-अतो ब्रवीमि ‘स एव’ “नव्यः” ‘नवजातः पुत्रः’ य “वाजी” ‘वेजनवान्’ परेभ्यो भयदाता “अभीषाट्” अभि- षहमाणः’ अभिभवन् सपत्नान् “नः” अस्माकम् “ऐतु” आगच्छतु न परकीयः पुत्रः सङ्कल्पितः इत्यर्थः । चाहे बहुत सुखका देनेवाला, सेवा करनेवाला और हितका चाहनेवाला भी क्यों न हो, परन्तु जिसके साथ जलका सम्बन्ध न हो उसे पुत्र कभी न बनाना चाहिये; तथा “अन्योदर्य” दूसरेके डाले हुए वीर्य्यसे उत्पन्न हुआ या दूसरेकी पत्नीके पेटसे उत्पन्न हुआ मनसे भी सङ्कल्प न करना चाहिये कि-यह मेरा पुत्र है । क्योंकि फिर भी वह अपने उस पुराने घर या वंशमे आ जाता है । जिससे कि-ऐसा है, इससे मैं कहता हूं कि-वह नव्य नवजात (नया पैदा हुआ) पुत्र जो शत्रुअ का भय देनेवाला और उन्हे तिरस्कार करने वाला हमें पुत्र मिले, अर्थात् दूसरेका पुत्र हमारा सङ्कल्पित या वाञ्छित नहीं है । (नि० अ० ) नहीं ही लेना चाहिये, जिसके साथ जलका सम्बन्ध नहीं, चाहे बहुत सुखदायी भी हो । दूसरेके पेटसे उत्पन्न हुआ (पुत्र) मनसे भी न मानना चाहिये कि-यह मेरा है। क्योंकि वह उस स्थानको फिर भी आ जाता है, जहाँसे वह आया हुआ होता है। ‘ओकस्’ यह निवासका नाम कहा जाता है। मिले