निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ ३ अ० १ पा० १ खंड । अप्नः (७)। गयः (८)। जाः (८)। अपत्यम् (१०)। यहुः (११)। सूनुः (१२)। नपात् (१३)। प्रजा (१४) बीजम् (१५)]। इति पञ्चदश अपत्य नामानि ॥ २ ॥ (खण्ड १) [निरुक्तम्] ओ३म् । कर्मनामानि उत्तराणि षड्विंशतिः। कर्म कस्मात् ? क्रियते-इति सतः। अपत्यनामानि उत्तराणि पञ्चदश। अपत्यं कस्मात् ? अपततं भवति। न अनेन पतति इति वा। तद्-यथा जनयितुः प्रजा-एवमर्थीये ऋचा उदाहरिष्यामः ॥ १ ॥ अर्थ। ज्वलत्के नामोंके पीछे छब्बीस (२६) कर्मके नाम हैं। [क्योंकि कर्मोंको करता हुआ ही तेजसे जलता है अथवा चमकता है, इसीसे ज्वलत्के नामोंके पश्चात् कर्म कहे गये हैं।] 'कर्म' शब्द किस धातुसे है? 'क्रियते' किया जाता है ऐसे कर्मवाच्य 'कृञ्' (त० उ०) धातुसे है। प्रकृत कर्म नामोंके पीछे पन्द्रह (१५) अपत्यके नाम हैं। [क्योंकि सब कर्मों में पितृऋणके दूर करनेके द्वारा अपत्य या सन्तानका उत्पन्न करना ही प्रधान कर्म है, इससे, कर्मनामोंके पश्चात् अपत्य-नाम कहे गये हैं।]