निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ३ 'अपत्य' क्यों है ? अप-तत अर्थात् पितासे आकर अलग जैसा विस्तृत होता है। अथवा इसके उत्पन्न हुए हुए होनेसे पितर नरकमे नहीं गिरते हैं [ इससे अपत्य है । ] [ धर्मके जाननेवाले पुरुष विवाद करते हैं कि दोनोंके सन्निपात या उपस्थितिमें क्या क्षेत्रवालेका अपत्य है या बीज वालेका ? सो यह कहा जाता है कि ] 'जिस प्रकार उत्पन्न-करनेवाले या बीजवालेका ही अपत्य या प्रजा है इस प्रकारकी व्यवस्थामें दो ऋचाए उदाहरण करते हैं । ( खण्ड २ ) “परिषद्यं ह्यररणस्य रेक्णो नित्यस्त एयः पतयः स्याम। न शेषो अग्ने अन्यजात मस्त्यचेतानस्य मा पथो विदुक्षः ॥” [ ऋ० सं० ५, २, ६, २ ] [ भा० ] परिहर्त्तव्यम् हि न उपसत्तव्यम्, अरणस्य रेक्णाः । अरणः, अपार्णो भवति । 'रेक्णः, इति धननाम । रिच्यते प्रयतः । नित्यस्यरायः पतयः स्याम ।” पित्र्यस्य इव धनस्य । “न शेषो अग्ने अन्यजात मस्तिः ।” 'शेषः' इति अपत्यनाम । शिष्यते प्रयतः । अचेतयमानस्य तत् प्रमत्तस्य भवति । “मा” नः “पथो” “वि” दुदुषः-इति । तस्य उत्तरो भूयसे निर्वचनाय ॥ २ ॥