निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ ३ अ० १ पा० २ खं० । व्याख्या। यद्यपि “परिषद्यं हि” यह ऋचा ‘अपत्य’ शब्दके निर्वचनमें किसी अर्थको पुष्ट नहीं करती, इससे इसे यहां न पढ़ना चाहिये था। [ व्याकरणके समान निरुक्तमें भी शब्दोंका ही अनुशासन है, अतः शब्द ही उसके विषय हैं, उनके व्याख्यानमें उनके अर्थको पुष्ट करनेके लिये जो मन्त्र रखा जाता है वह वहाँ निगम नामसे बोला जाता है और आवश्यक होता है, किन्तु यह ऋचा उस कार्यको नहीं करती । ] तथापि ‘अपत्य शब्दके अर्थ अपत्य या पुत्रके सम्बन्धकी एक ऐसी मार्मिक बातको यह ऋचा कहती है, जो अपुत्र मनुष्य पुत्रकी लालसा रूप अग्निको बुझानेके अर्थ दत्तक- कृत्रिम आदि पुत्र करते हैं, उन्हें याद रखने और विद्वानोंको हृदयङ्गम करने योग्य है, ऐसा जान कर आचार्यने इसे यहाँ रख दिया है। इसके अतिरिक्त यह भी इस ऋचाके द्वारा आचार्यने दिखाया कि, जिस प्रकार स्मृतियोंमें धर्मके अनेक रहस्य विस्तारसे दिखाये हैं, उसी प्रकार वेदमें भी वैसे ही रहस्य विस्तार पूर्वक हैं। वसिष्ठजी इस मन्त्रमें अपने देवतासे दो प्रार्थनाएं (दरखास्तें) करते हैं (क) हम नित्य (अपत्य) धनके पति हों। (ख) हमे सच्चे मार्गसे भुलावा न दें। इन प्रार्थनाओंके ठहरानेमें तीन कारण दिखाये हैं (क) असम्बन्धीका (अपत्य) धन परित्याज्य है (ख) हे अग्ने ! अन्यजात अपत्य (पुत्र) नहीं होता। (ग) किन्तु वह अचेतान (अनजान) को होता है। अरण या अपगतोदक-सम्बन्ध ।— “सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते । समानोदक-भावस्तु जन्मनाम्नो खेदने ॥” [ मनु० ५, ६० ]