निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 314, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्याज्य या पुत्र-भावसे मानने योग्य नहीं हैं। इस कारण कहते हैं कि-इस नित्य (जो सदा हमारे सङ्ग रहे) पुत्ररूप धनके पति या स्वामी होवें। हे अग्नि देव ! दूसरेसे उत्पन्न हुआ अपत्य नहीं होता। अर्थात् जो ही उसे उत्पन्न करता है, उसीका वह होता किन्तु दूसरेका नहीं। अनजानको ही वह सन्तोष मात्र है, कि- यह मेरा अपत्य है पर वास्तवमे वह अपत्यका काम नहीं देता। अतः हम कहते हैं कि-हमें हमारे बाप दादोंकी मर्यादासे मत गिराओ। प्रयोजन यह कि-हमें औरस पुत्र दो। [ निरुक्तार्थ ] [ १ म पा० ] क्योंकि अरण या जलके सम्बन्धसे रहित पुरुषका रेक्ण या अपत्यधन छोड़ने योग्य है,या पास जाने योग्य नहीं है। 'अरण' नाम अपार्णका है, अर्थात् जिसके साथ जलका सम्बन्ध नहीं। 'रेक्ण' नाम धनका है। क्योंकि वह इस लोकसे परलोकको जाते हुए या मरते हुएका यहीं रह जाता है, या उससे वह खाली हो जाता है। [ द्वि० पा० ] हम 'नित्य' जो अपने संगको कभी न छोड़े, धनके पति होवें। जैसे कि बापके धनका स्वामी बेटा हो जाता है। [ तृ० पा० ] हे अग्निदेव ! दूसरेसे उत्पन्न हुआ 'शेष' नहीं है। 'शेष' यह नाम अपत्यका है। क्योंकि मरते हुएका वह शेष (बचा हुआ) रह जाता है। [ च० पा० ] 'अचेतयमान' या प्रमादीका वह होता है। हमें उस मार्गसे मत अलग करो। इसी अपत्य शब्दके निर्वचनके प्रसङ्गमें इस मन्त्रकी व्याख्या की गयी है, और आगेका मन्त्र प्रसक्तानुप्रसक्त ही कहा गया है, इसी अभिप्रायसे आचार्य कहते हैं—"तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय।" अर्थात् उसी मन्त्रकी पर्याप्त (काफी) व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥२॥