निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ ३ अ० १ पा० ४ खं० । "अङ्गादङ्गाद्" इस ऋचाको बाप परदेशसे आकर पुत्रके मस्तक- में पढ कर सूंघता है। यह अनुष्टुप् छन्द है। पुत्रसे कहता है—'हे पुत्र ! तू मेरे अङ्ग अङ्गसे हुआ है। और तू मेरे हृदयसे हुआ है। तू पुत्रके नामसे मेरा आत्मा ही है। सो तू सौ वर्ष जी ।" "स्त्री और पुरुषरूप जो पुत्र उनका धर्मके अनुसार समानतासे दाय होता है। यह स्वयम्भूके पुत्र मनुने सृष्टिके आरम्भमें कहा है।" कोई धर्मवेत्ता कहते हैं कि—"कन्याएँ दायभागिनी नहीं होतीं।" "इससे पुरुष दाय (पैतृक-सम्पत्ति) का भागी होता है, स्त्री 'अदायादा' दायकी अधिकारिणी नहीं होती" यह इस ब्राह्मणके विचारसे प्रतीत होता है। [दूसरा ब्राह्मण] ["क्योंकि हवन कर्मसे स्थालीको अलग कर देते हैं, फिर उससे होम नहीं करते" काष्ठके पात्रको अलग नहीं करते फिर उसीसे होम करते हैं"] "इससे उत्पन्न हुई हुई स्त्री (कन्या) को अलग कर देते हैं या दूसरेको दे डालते हैं, किन्तु पुरुषको नहीं" ["इससे पुरुष ही बापके धनका स्वामी बनता है, कन्या नहीं"] और स्त्रियोंके दान, विक्रय (बेचना) और अतिसर्ग (त्याग) हैं, पुरुषके नहीं। क्योंकि वह दूसरेको दे दी जाती है, और वैवाहिक शुल्कसे बेच दी जाती है। जैसा कि—सुभद्राहरणमें भगवान् कृष्णने कहा है:— "विक्रयश्चाप्य पत्यस्य मतिमान् को न मंस्यते । स्वल्पो वाथ बहुर्वाऽपि विक्रयस्तावदेव सः ॥" (महाभारत)