निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ३५ अर्थात् “बल-परीक्षा आदि रूपसे जो कन्या दी जाती है, यह अपत्य (सन्तान) का बेचना ही है, कौन बुद्धिमान् इसे न मानेगा। थोड़ा हो या बहुत, वह विक्रय ही हुआ । अतिसर्ग नाम त्यागका है । क्योंकि—बन्धुओंसे कन्या छोड़ दी जाती है, स्वयंवरमें जिसे गर्व हो वह तुझे ले लेवे, या जो तुझे अच्छा लगे उसे तू ले ले । सो यह क्षत्रियोंका ही स्वयंवर धर्म है, और वर्णोंका नहीं। किन्तु यह और वर्णोंके लिये भी प्रमाण है, कि-कन्याओंका दाय नहीं होता। इससे कन्या दायभागिनी नहीं होती । और धर्मवेत्ता मानते हैं कि—पुरुषके भी विक्रियादि हैं। क्योंकि वेदमें शुनः शेपके आख्यानमें देखा जाता है। अर्थात् जो यह कहा है कि ‘दान, विक्रय और अतिसर्गके कारण स्त्रीका दाय नहीं’ यह व्यभिचारी हेतु है । क्योंकि—दान, विक्रय और अति- सर्ग पुरुषके भी अवश्य हैं। जैसे कि—बारह पुत्रोंमें दत्तक और क्रीतक पुत्रोंका होना वेदके और महाभारतके शुनः शेपके आख्यान- में उसके दान और विक्रय, एवम् विश्वामित्रके द्वारा मधुच्छन्द आदि पुत्रों का त्याग प्रसिद्ध है । इससे इन हेतुओंको दोनों ओर होनेके कारण दोनोंका दायभागित्व समान है। उपर्युक्त मन्त्रसे जो कन्याका धनभागित्व आता है, “यह भ्रातासे रहित कन्याके लिये है—” यह अन्य आचार्य-मत है। अर्थात् जिस कन्याका भाई नही होता, वही पिताके धनकी स्वामिनी होती है, किन्तु भाई वाली नहीं। क्योंकि—पिताको पिण्ड देने वाले पुरुषोंके रहते हुए स्त्री धन नहीं पा सकती क्यों कि वह दूसरेके वंशको बढ़ाती है, इस कारण वह अर्थभागिनी नहीं होती। और अभ्रातृका (भाईसे रहित) कन्यामें यह विशेष है, कि उसके बापको दूसरा पुत्र नहीं है, इस कारण उसके