निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 325, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ ३ अ० १ पा० ४ खं० । अर्थ पिण्डदान आदि कार्योंमें दौहित्र (दोहता) ही खड़ा होता है, अतः अभ्रातृका ही धनकी अधिकारिणी होती है। जैसा कि कहा है— “पिता उत्सृजेत् पुत्रिकाम्-अनपत्योऽग्निं प्रजा- पतिंच इष्ट्वा अस्मादर्थमपत्यम्-इति संवाद्य अभि- सम्भानमात्रं पुत्रिका”-इति एकेषाम् । अर्थात् ‘पुत्ररहित पिता अग्नि और प्रजापतिका यजन करके ‘इससे मुझे पुत्र अर्थ है’, यह ठहरा कर पुत्रिकाको छोड़े, पुत्रिका नाम मात्रै है, (वस्तुतः मेरा यह बेटा ही है) यह कोई आचार्योंका मत है । यह अर्थ एक मन्त्रकी उपमासे भी आता है :— “अमूर्या यन्ति जामयः सर्वा लोहितवाससः । अभ्रातर इव योषा स्तिष्ठन्ति हतवर्त्मनः ।” [ अथ० सं० १, १७, १ ] यह ऋचा अथर्ववेदकी है। इसका स्त्रियोंके प्रदर (योनिसे निरन्तर रक्तका बहना) रोगके रोकनेवाले कर्ममें विनियोग होता है । इन सब नाड़ियोंके मार्ग रुके, और ये रक्तको निरन्तर न बहाष, जैसे बिना भाईकी सब बहिने स्त्रियें लाल वस्त्रोंसे बापके घरमें ही सन्तानके पिण्डदानरूप कर्मके लिये रुके हुए मार्ग होकर ठहर जाती हैं । इस मन्त्रकी उपमासे अभ्रातृका कन्याके विवाहका निषेध आता है। इसकी विस्तृत व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥ ४ ॥—”