भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 326

हिन्दी निरुक्त । १७ व्याख्या । इस खण्डमें कन्याके धनभागित्वमें चार मत दिखाये हैं :- ( क ) पुत्रके समान कन्या भी पिताके धनकी भागिनी होती है । ( ख ) पुरुष ही पिताके धनका स्वामी होता है, किन्तु स्त्री नहीं । क्योंकि-उसके दान, विक्रय और त्याग होते हैं, पुरुषके नहीं । ( ग ) शुनः शेप और मधुच्छन्द आदिके दृष्टान्तसे पुरुषमें भी दान आदि दोष हैं, इससे दोनों स्त्री पुरुष पिताके धनके स्वामी समान हैं । ( यह मत प्रथम मतकी पुष्टि मात्र है । ) ( घ ) जिस कन्याके भाई नहीं होता, वही अपने पिताके धनकी स्वामिनी होती है । क्योंकि—उसके विवाहका निषेध होनेसे वह पिताके ही वंशको बढ़ानेवाली, और उसीके घरमें रहनेवाली होती है । यह चतुर्थ आचार्यका सम्मत है । और इसी पर सब वाक्यों- की सङ्गति होती है । अन्य मतोंमे किसीको भी माननेसे दूसरे पक्षके प्रमाण रुष्ट हो जाते हैं, किन्तु इस मतमें जो कन्याको धन दिलाने वाले प्रमाण हैं, वे अभ्रातृमती कन्याको दिला देते हैं । सुतराम् इस पक्षमें सब प्रमाणोंको अवकाश मिल जाता है । अभ्रातृमतीको जो पुरुष विवाहता है, वह किसी अन्य लोभसे काम्य-विवाह करता है, किन्तु उसे अपने वंशकी वृद्धिके लिये दूसरा विवाह भी करना होता है । अथर्वकी ऋचामें जो कन्याओंको “लोहितवाससः” “हतवर्त्मानः” ये दो विशेषण दिये हैं, वे अभ्रातृका कन्याके लिये वरकी दुर्लभताको स्पष्टरूपसे सूचित कर रहे हैं। क्योंकि—उनकी सन्तान उनके पिताओंकी ही होती है, इस लिये कोई वर सहजमें उनके निकट नहीं आता तथा विना ही कारणके एक व्यर्थ स्त्रीका विवाह करे, और फिर दूसरी स्त्रीका भी ३

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