निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ ३ अ० १ पा० ५ खं० । अपने सन्तान कर्मके लिये करे, क्यों ? इसी गौरवके टंटेसे वे पिताके घरमें ही रजस्वला हो जाती हैं तथा उनके मार्ग या फाटक बन्द हो जाते हैं । पक्षान्तरमें इससे यह भी आता है कि--जो भ्रातृमती कन्याएँ होती हैं, उन्हें पहिलेसे ही वर मिल जाते हैं तथा उन्हें पिताके घरमें रक्तवस्त्र नहीं होना पड़ता । इससे कन्याके विवाहका मुख्य- काल रजोदर्शनसे पहिले ही है। यह मन्त्रके उक्त पदोंसे निकलतो हुई घृणासे आता है। इस पर उन्हें भी ध्यान देना चाहिये जो लड़कीके अठारह वर्षसे ऊपर विवाहके पक्षपाती तथा वेदिक हैं ॥ ४ ॥ • ( खण्ड ५ ) [ निरु० ] “अभ्रातेव पुंस एति प्रतीची गर्त्ता- रुगिव स नये धनानाम् । जायेव पत्य उशती सुवासा उषा हस्रेव निरिणीते अप्सः॥” [ ऋ०स० १,१,२४,७] अभ्रातृका-इव पुंसः पितॄन्-एति अभिमुखी, सन्तानकर्मणे पिण्डदानाय न पतिम् । गर्त्तारोहिणी- इव धनलाभाय दाक्षिणाजी । गर्त्तः सभास्थाणुः । गृणातेः । सत्यसंगरो भवति । तं तत्र या-अपुत्राया- अपतिका, सा आरोहति । तां तत्र अक्षैः-आघ्नन्ति, सारिक्थं लभते । [ गर्त्तप्रसक्तम्- ] श्मशानसञ्चयोऽपि गर्त्त। उच्यते । गुरतेः । अपगूर्णो भवति । श्मशानं