निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १३
“दधचे” ‘आत्मानं सन्दधाति’ यदत्र पुत्रिकायाम् अपत्यमुत्पत्स्यते तन्मम’ इति सन्धारयति इत्यर्थः । स्त्रीका पति जो उसका ब्याहने वाला है, उसमें होनेवाली पुत्रीमें सन्तान कर्मके अर्थ पुत्रभावको मानता है, या प्रसिद्ध करता है । [ अर्थात् ] मनसे इस बातको पक्की कर लेता है कि—इस होनेवाली पुत्रीमें जो पुत्र होगा ( दौहित्र ) वह मेरा पौत्र ( पोता ) होगा । [ क्योंकि ] वह गर्भाधान यज्ञ अथवा वीर्यके सम्बन्धको जाननेवाला तथा विधानका माननेवाला है । प्रयोजन यह कि—जिस मन्त्र और जिस विधानसे पुत्रके उत्पन्न करनेमें वीर्यका स्थापन होता है, उसीसे पुत्रीके उत्पन्न करनेमें भी । [ उत्तरार्द्ध ] जिस कालमें कन्याके दानसे पहिले वरको जामाता ( जँवाई ) बनाता है, उस समय उसे कन्या देता हुआ अपुत्रताके सन्तापसे रहित मनसे यह धारणा दृढ़ कर लेता है कि—इस कन्यामें जो पुत्र होगा वह मेरा होगा । ( निरुक्तार्थ ) ब्याहनेवाला पति सन्तानके अर्थ अपनी स्त्रीमें उत्पन्न होनेवाली दुहिता ( कन्या ) में पुत्रभावको मान लेता है । ‘दुहिता’ नाम दुर्हिताका है, अर्थात् जो दूर रहती हुई भी पिताके लिये हित-शुभ चाहनेवाली होती है । ‘अथवा’ ‘दुह’ प्रपूरणे ( अदा० उ० ) धातुसे है । क्योंकि—वह प्रार्थना स्वभाव होनेके कारण नित्य ही पितासे धनको दोहती रहती है । दौहित्रको नप्ति या पौत्र मानता है । गर्भाधानके यज्ञ अथवा वीर्यको जानने- वाला है । अङ्ग अङ्ग ( सब अङ्गों ) से, हृदयके अनुस्मरणसे उत्पन्न एवम् माताके प्रति गये हुए वीर्यके विधान को आदर करता हुआ, ‘समानतासे कन्या और पुत्र दोनो दायाद या धनके उत्तराधिकारी हैं'—मानता है । सो यह दो ऋचा-श्लोकों से कहा गया है—