निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 394, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ८७ में 'श्वा' (कुत्ता) 'काक' (कौआ) शब्द। 'काक' यह शब्दके अनुकरण पर नाम है। सो यह पक्षियोंमें प्रायकरके होता है। “शब्दके अनुकरण नहीं है” यह औपमन्यव (उपमन्युका पुत्र) मानता है। 'काक' (क्यों ?) अपकालयितव्य (हटाने योग्य) होता है। 'तित्तिरि' (क्यों ?) तरनेसे। अथवा वह तिलके बराबर चित्र वर्ण वाला होता है। 'कपिञ्जल' (क्यों ?) कपि (वानर) के समान रङ्गमें होता है। अथवा बानरके समान भागता है। अथवा कम (थोड़ा) पीलासा होता है। अथवा कमनीय (मनोहर) शब्दको पिञ्जता (बोलता) है। 'श्वा' (क्यों ?) आशु (शीघ्र) चलता है। अथवा गति अर्थमें 'शिव' (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा श्वास अर्थमें 'श्वस्' (अदा० प०) धातुसे है। 'सिंह' (क्यों ?) सहन करनेसे। अथवा हिंसा अर्थमें 'हिंस' (रु० प०) धातुके उलटे रूपसे है। अथवा 'सम्' (उप०) सहित 'हन्' (अ० प०) धातुसे है। 'व्याघ्र' (क्यों ?) विशेष सूंघनेवाला होनेसे। अथवा मुख फैलाकर मारता है ॥ १ ॥ (खण्ड २) [ निघ० ] अष॑ति (१)। गासति (२)। रेभति (३)। स्तोभति (४)। शूर्द्धय॑ति (५)। गृणाति (६)। जरते (७)। ह्वयते (८)। नदति (६)। पृच्छति (१०)। रिहति (११)। धमति (१२)। कृपायति (१३)। कृपयति (१४)। पनस्यति (१५)। पनायते (१६)। वलगूयति (१७)। मन्दते (१८)। भन्दते (१८)। छन्दति । (२०)। छदयते (२१)। शशमानः (२२)।