भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

१०२ ३ अ० ४ पा० ४ खं० । भ्यसते
रेजते / इति भयचलनयोः । “यस्य शुष्माद् रोदसी अभ्यसेताम् ।” [ ऋ० सं० २-६-७-१ ] “रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः ।” [ ऋ० सं० ५-१-२-४ ]

  • इत्यपि निगमौ भवतः । द्यावापृथिवी नामधेयानि उत्तराणि चतुर्विंशतिः तयो रेषा भवति ॥ ४ ॥ ( २१ ) अर्थ । आगे एक एक वस्तुके दो दो नाम नाम हैं, [ जैसे- प्रपित्वे
    / ये आसन्न या समीपमें रहनेवालेके दो नाम हैं । अभीके / ‘प्रपित्वा’ नाम प्राप्त और ‘अमीक’ नाम अभ्यक्त या पासमें लगे हुए का है । (१) “हे इन्द्र ! पान कालके प्राप्त होते ही तुम हमारे यहाँ शीघ्र आओ” । (२) संग्राम कालके प्राप्त होनेपर इन्द्र
    उपस्थित होता है । / ये भी निगम हैं” दभ्र
    / ये अल्प (थोड़े) के नाम हैं । अर्भक /