निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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१०२ ३ अ० ४ पा० ४ खं० ।
भ्यसते
रेजते / इति भयचलनयोः ।
“यस्य शुष्माद् रोदसी अभ्यसेताम् ।”
[ ऋ० सं० २-६-७-१ ]
“रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः ।”
[ ऋ० सं० ५-१-२-४ ]
- इत्यपि निगमौ भवतः ।
द्यावापृथिवी नामधेयानि उत्तराणि चतुर्विंशतिः
तयो रेषा भवति ॥ ४ ॥ ( २१ )
अर्थ ।
आगे एक एक वस्तुके दो दो नाम नाम हैं, [ जैसे-
प्रपित्वे
/ ये आसन्न या समीपमें रहनेवालेके दो नाम हैं । अभीके / ‘प्रपित्वा’ नाम प्राप्त और ‘अमीक’ नाम अभ्यक्त या पासमें लगे हुए का है । (१) “हे इन्द्र ! पान कालके प्राप्त होते ही तुम हमारे यहाँ शीघ्र आओ” । (२) संग्राम कालके प्राप्त होनेपर इन्द्र
उपस्थित होता है । / ये भी निगम हैं” दभ्र
/ ये अल्प (थोड़े) के नाम हैं । अर्भक /