निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ ३ अ० ४ पा० ४ खं० ।
हे इन्द्र ! तुम “पात्रा इव भिन्दन्” लाठीसे मिट्टीके बर्तनोंको
फोड़ते हुएके समान “रक्षसः' 'भिन्दन्' राक्षसोंको मारते हुए
“सतः” प्र स दूर देशसे “एति” मेरे यज्ञमें आओ ।
ये भी दो निगम हैं। [अपि शब्दसे ओर निगमोंकी सूचना है।
त्वः
नेमः ⎭ ये दो अर्द्ध (आधे) के हैं।
त्व' 'अपैत्य ततः' हट कर विस्तृत है ।
'नेम' काट कर नीत या अलग किया है ।
अर्द्ध' विपरीत 'हृ' (भ्वा० उ०) धातुसे है । अथवा 'हारि'
(हृ-णिच्) (चु० उ०) धातुसे है, क्योंकि वह उद्धृत या निकाला
हुआ होता है। अथवा ऋध् (स्वा० प०) से है। [क्योंकि]
वह ऋद्धतम या बहुत बढ़ा हुआ विभाग है।
'पीयति त्वो”......... ।
अर्थात् हे अग्ने ! दो भागोंमें बटे हुए, प्रजापतिसे उत्पन्न हुए,
देवताओं और असुरोंमेंसे 'त्वः' आधा असुर भाग तेरे तन्को
'पीयति' हिंसा करता है और त्वः' आधा देवभाग 'अनुगृणाति'
स्तुति करता है।
“नेमे देवाः नेमेऽसुराः” ...... ।
अर्थात् 'नेमे' आधे 'देवाः' देव 'नेमे' आधे 'असुराः' असुर
हुए।
ये भी दो निगम होते हैं।
ऋक्षाः
स्तृभिः ⎭ ये दोनों नक्षत्रोंके नाम हैं।
'नक्षत्र' गति अर्थमें 'नक्ष' (भ्वा० प०) धातुसे है ।