निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त। १०५
किन्तु ब्राह्मण-‘इमानि’ ये ‘नक्षत्राणि’ घृत ‘न’ नहीं हैं, किन्तु
घृतसदृश हैं। अर्थात् सूर्य्यके किरण लगनेसे सुवर्णके समान
चमकते हैं।”
‘ऋक्षाः’ क्यों ? उदीर्ण या किसीसे आधे किये हुए जैसे
दिखाई देते हैं।
‘स्तृभिः’ क्यों ? स्तीर्ण या फैले हुए जैसे दिखाई देते हैं।
“अमी ये”………… । अर्थात्
“अमूनि” वे ‘यानि’ जो ‘ऋक्षा’ नक्षत्र ‘उच्चा’ ऊंचे ‘निहितास’
रखे हुए हैं।”
“पश्यन्तो………… ।”
“हे अग्ने ! ‘स्तृभिः’ नक्षत्रोंसे ‘द्याम्-इव’ द्युलोक को जैसे
‘पश्यन्तः’ देखते हुए हम तुम्हे स्तुति करते हैं।
वम्री
$\Big}$ ये दो सोमिकाओं या चींटियोंके नाम हैं।
उपजिह्विका /
‘वम्री’ क्यों ? वमन करनेसे ।
‘सीमिका’ क्यों ? स्यमन या नित्यगमन करनेसे ।
‘उपजिह्विका’ क्यों ? उपघ्राण या सूंघनेसे ।
“यदत्त्युप”………… ”। अर्थात्—
“उपजिह्विका” चींटे ‘यत्’ जो ‘आंत्त’ भीतर घुस कर खातो
हैं। और ‘वम्रः’ किसी प्रकारकी चींटी (दामक) ‘यत्’ जिसे
‘अतिसर्पति’ गीली मिट्टीसे लपेटती हुई व्यापन करतो है, हे अग्नि-
देव ! ‘तत्’ वह ‘सर्वम्’ सब ‘ते’ तेरे लिये ‘घृत’ वो ‘अस्तु’ हो।
ऊर्दर
$\Big}$ ये दो ‘आवपन’ कोठी अथवा थैलेके नाम हैं।
कृदर /
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