निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ ३ अ० ४ पा० ४ खं० ।
'ऊर्दर' क्यों ? उद्दीर्ण या ऊपरसे फटा हुआ होता है । अथवा
बलके लिये फटा रहता है ।
"तमूर्दरं न......... । अर्थात्
हे अध्वर्युओं ! यव अन्नसे कोठोके समान सोमसे इन्द्रको पूर्ण
कर दो—जिस प्रकार कोई पुरुष यव अन्नसे कोठोको पूरण करता
है, वैसे ही तुम सोमसे इन्द्रको पूर्ण करो । [ यह 'पूरयति' पदकी
संगतिके लिये है । ]
'कुदर' क्यों ? कुतद्दर या उसमें द्वार किया हुआ होता है ।
"समिद्धो......... ।" अर्थात् 'समिद्धः' प्रज्वलित हुआ
देवताओंके 'मतीनाम्' मतियोंके 'कुदरम्' फैले रूप । [ क्योंकि
लिप्सासे उनकी बुद्धि वहाँ आकर ठहरती है। घृतको 'अञ्जन'
अपनी ओर ले जाता हुआ, यह भी निगम है ।
४र्थ खण्ड ।
रम्भ
पिनाक } ये दो दण्डके नाम हैं ।
'रम्भ' क्यों ? इसे मर्यादासे न गिरनेके लिये आरम्भ करते हैं।
"आ त्वारम्भं......... । अर्थात् –
"हे इन्द्र ! 'जिव्रयः' वृद्ध 'रम्भं न' लाठीको जैसे (वयम्
हम ) 'त्वा' तुझे 'आ' रभामहे' आरम्भ या आश्रयण करते हैं ।
'पिनाक' क्यों ? इससे अपराधोको प्रतिपेषण या मारा
जाता है ।
"कृत्तिवासाः......... ।"
[ "एषते रुद्र भागस्तेनावसेन परोमूजवतोऽवोह ।
अवततधन्वा पिनाक-हस्तः कृत्तिवासा" ]
[ य० वा० सं० ३, ६१, ]