निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १०७ “हे रुद्र ! तेरे लिये यह भाग है, इस पथवाड़ेको लेकर तुम धनुषको कन्धे पर रखकर हाथमें पिनाक या लाठी लेकर चर्मवस्त्र को धारण किये हुए मूजवान् पर्वतसे परे चले जाओ ।” यह भी निगम है । मेना \Bigg} ये दो स्त्रियोंके नाम हैं । ग्ना ‘स्त्री’ लज्जार्थक ह्यै (भ्वा० प०) धातुसे है । (क्योंकि-प्राय वे लज्जावाली होती हैं ।] ‘मेना’ क्यों ? इन्हें पुरुष मान करते हैं । ‘ग्ना’ क्यों ? इन्हें पुरुष मान करते हैं । “अमेनांश्चित्............ ।” अर्थात्— “हे इन्द्र ! तुम स्त्री रहितोंको भी अपने भक्तोंको स्त्रीको उत्पन्न करनेवाले बनाते हो ।” “ग्नास्त्वा............।” अर्थात्— “हे वस्त्र ! “ग्नाः त्वा अकृन्तन्” स्त्रियोंने तुझे काता है । “अपसः अतन्वत” जुलाहेके छोटे छोटे लड़कोंने तुझे तना है ।”— ये भी दो निगम हैं । शेप \Bigg} ये दो पुंस् प्रजनन (लिङ्ग) के नाम हैं । वैतस ‘शेप’ क्यों ? स्पर्श अर्थमें ‘शप्’ (भ्वा० प०) धातुसे है । [क्योंकि इससे स्त्रीको स्पर्श किया जाता है।] ‘वैतस’ क्यों ? स्त्रीके स्मरणसे पहले ‘वितस्त’ या सङ्कुचित होता है । “यस्यामुशन्तः.........।” अर्थात्— “हे भगवन् ! पूषन् ! जिस योनिमें पुत्रको कामना करते हुए हम शेप या लिङ्गका प्रहार करते हैं ।”