निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ ३ अ० ४ पा० ४ खं० । “त्रिः स्म……………” । इस मन्त्रमें उर्वसी और पुरूरवाकी पुराण प्रसिद्ध कथाका मूल है। पुरूरवाने उर्वशीसे कहा-कि-'तू मत जा, ठहर, उस पर उर्वशीने कहा कि—“हे पुरूरवः ! 'अन्हः' दिनके 'त्रिः' तीनवार 'त्वम्' तूने 'मा' मुझे 'वैतसेन' शिश्नदण्डसे 'श्नथयः' ताडन किया है”…………इत्यादि । ये भी दो निगम हैं । अया } एना } ये दो उपदेशके नाम हैं । [ यह उपदेश स्त्री पुंस और नपुंसक तीनों लिङ्गोंमें आता है ।] 'अया ते…………” । अर्थात्– “हे अग्ने ! भगवन् ! 'अया' अनया 'समिधा' इस समिध् से 'ते' तेरो 'विधेम' परिचर्या करते हैं ।” 'अया' यह समिध् के साथ स्त्री लिङ्ग है । “एना वो अग्निम्”………… । अर्थात्– “मैं 'वः' 'एना' 'नमसा' तुम्हारे इस प्रस्तुत अन्नसे 'अग्निम्' 'आहुवे' अग्निको बुलाता हूं ।” 'एना' यह 'नमसा' नपुंसक पदके साथ नपुंसकका उपदेश है । “एना पत्या तन्वं व संसृजस्व”………… । अर्थात्– “हे वधु ! इस पतिसे अपने तन् ( शरीर ) को मिला दे ।” 'एना' यह पति शब्दके साथ पुलिङ्ग उपदेश है। सिषक्तु } सचते } ये दो सेवाके वाचक हैं । “सनः सिषक्तु………… ।” अर्थात्– 'वह हमारी सेवा करे, जो शीघ्रकारी हो ।'