भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 415

हिन्दी निरुक्त । १०६ "सचस्वानः स्वस्तये…………।" अर्थात्— 'हमारे कल्याणके अर्थ संयुक्त हो।' 'स्वस्ति' यह अविनाशी (नहीं नष्ट होनेवाले) का नाम है। अस् (अदा० प०) धातु प्रशंसा अर्थमें है। 'सु' और 'अस्ति' से स्वस्ति शब्द बना है। भ्यसते
रेजते } ये दो धातु भय और वेपन या कम्पन अर्थमें हैं। "यस्य शुष्माद् रोदसी…………।" अर्थात्— "जिसके क्रोधसे पृथिवी और द्युलोक काँपते हैं, या डरते हैं।" ( "प्रचित्र मर्कः" ) 'रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः" । अर्थात्- "हे अग्ने ! 'मखेभ्यः' जिन पूजनीय मरुतोंसे 'पृथिवी' 'रेजते' काँपती या डरती है।" ये दो निगम हैं। आगे द्यावा पृथिवी ( द्युलोक और भूलोक ) के चौबीस ( २४ ) नाम हैं। उनके साहचर्य या एक साथ रहनेको कहनेवाली यह ऋचा है ॥ ४ ॥ (२१), ( खं० ५ ) [ निरु०-] "कतरा पूर्वा कतरा परायोः कथा जाते कवयः को विवेद । विश्वं त्मना बिभृतो यद्धनाम विवर्त्तते अहनी चक्रियेव ॥" [ऋ० सं० २, ५, २, १,] कतरा पूर्वा कतरा परा अनयोः कथं जाते कवयः क एने विजानाति । सर्वम् आत्मना विभृतः यद्धै- नयो कर्म विवर्त्तते च एनयोः अहनी अहोरात्रे