निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० ३ अ० ४ पा० ५ खं० । चक्रयुक्ते इव,- इति द्यावापृथिव्योर्महिमानमाचष्टे आचष्टे ॥ ५ ॥ २२ ॥ इति तृतीयाऽध्याय चतुर्थः पादः ॥ ३, ४ ॥ अर्थ । “कतरा पूर्वा” मन्त्रका अगस्त्य ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। यह ऋचा पृष्ठ और अभिप्लवके षष्ठ (६ ठे) दिनमें तथा महाव्रतके तृतीय सवनमें वैश्वदेव शस्त्रमे है। स्वयमेव (आप ही आप) अगस्त्य ऋषि बितर्क करता हुआ संशययुक्त होकर कहता है-इन दोनों (द्यावा पृथिवीओं) में कौन पूर्व है? और कौन अपर या पीछे हुई है? ये कैसे उत्पन्न हुई हैं? (एक साथ या आगे पीछे?) हे कवियो! कोई भी स्पष्ट-जानता है? किन्तु मै इतना शास्त्रसे कह सकता हूं कि ये हिरण्मय अण्डके दो टुकड़े हैं। जैसा कि कहा है—“अण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम्' तद् यद् रजतं सेयं पृथिवी यत् सुवर्णं सा द्यौः' अर्थात् अण्डेके दो कपाल या टुकड़े हुवे रजत (चाँदी) और सुवर्ण, जो वह रजत था सो यह पृथिवी, जो सुवर्ण था वह द्यौः (द्युलोक)। इससे जाना जाता है कि ये एक साथ हुए होंगे। और ये दोनों विश्व (जगत्) को अपनेसे धारण करते हैं, जिस लिये कि इनका नाम है। और इन्हींके भीतर रात्रि और दिन चक्रके समान बदलते हुवे रहते हैं। प्रयोजन यह कि-दो चक्रोंके समान ये द्यावा पृथिवी आपसमें जुड़े हुवे हैं। इस प्रकार ऋषि इस मन्त्रके द्वारा द्यावापृथिवीओंके महाभा- ग्यको कहता है।