निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । १०६
"सचस्वानः स्वस्तये…………।" अर्थात्—
'हमारे कल्याणके अर्थ संयुक्त हो।'
'स्वस्ति' यह अविनाशी (नहीं नष्ट होनेवाले) का नाम है।
अस् (अदा० प०) धातु प्रशंसा अर्थमें है। 'सु' और 'अस्ति' से
स्वस्ति शब्द बना है।
भ्यसते
रेजते } ये दो धातु भय और वेपन या कम्पन अर्थमें हैं।
"यस्य शुष्माद् रोदसी…………।" अर्थात्—
"जिसके क्रोधसे पृथिवी और द्युलोक काँपते हैं, या डरते हैं।"
( "प्रचित्र मर्कः" ) 'रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः" । अर्थात्-
"हे अग्ने ! 'मखेभ्यः' जिन पूजनीय मरुतोंसे 'पृथिवी' 'रेजते'
काँपती या डरती है।"
ये दो निगम हैं।
आगे द्यावा पृथिवी ( द्युलोक और भूलोक ) के चौबीस ( २४ )
नाम हैं। उनके साहचर्य या एक साथ रहनेको कहनेवाली यह
ऋचा है ॥ ४ ॥ (२१),
( खं० ५ )
[ निरु०-] "कतरा पूर्वा कतरा परायोः कथा जाते
कवयः को विवेद ।
विश्वं त्मना बिभृतो यद्धनाम विवर्त्तते
अहनी चक्रियेव ॥" [ऋ० सं० २, ५, २, १,]
कतरा पूर्वा कतरा परा अनयोः कथं जाते कवयः
क एने विजानाति । सर्वम् आत्मना विभृतः यद्धै-
नयो कर्म विवर्त्तते च एनयोः अहनी अहोरात्रे
११० ३ अ० ४ पा० ५ खं० । चक्रयुक्ते इव,- इति द्यावापृथिव्योर्महिमानमाचष्टे आचष्टे ॥ ५ ॥ २२ ॥ इति तृतीयाऽध्याय चतुर्थः पादः ॥ ३, ४ ॥ अर्थ । “कतरा पूर्वा” मन्त्रका अगस्त्य ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। यह ऋचा पृष्ठ और अभिप्लवके षष्ठ (६ ठे) दिनमें तथा महाव्रतके तृतीय सवनमें वैश्वदेव शस्त्रमे है। स्वयमेव (आप ही आप) अगस्त्य ऋषि बितर्क करता हुआ संशययुक्त होकर कहता है-इन दोनों (द्यावा पृथिवीओं) में कौन पूर्व है? और कौन अपर या पीछे हुई है? ये कैसे उत्पन्न हुई हैं? (एक साथ या आगे पीछे?) हे कवियो! कोई भी स्पष्ट-जानता है? किन्तु मै इतना शास्त्रसे कह सकता हूं कि ये हिरण्मय अण्डके दो टुकड़े हैं। जैसा कि कहा है—“अण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम्' तद् यद् रजतं सेयं पृथिवी यत् सुवर्णं सा द्यौः' अर्थात् अण्डेके दो कपाल या टुकड़े हुवे रजत (चाँदी) और सुवर्ण, जो वह रजत था सो यह पृथिवी, जो सुवर्ण था वह द्यौः (द्युलोक)। इससे जाना जाता है कि ये एक साथ हुए होंगे। और ये दोनों विश्व (जगत्) को अपनेसे धारण करते हैं, जिस लिये कि इनका नाम है। और इन्हींके भीतर रात्रि और दिन चक्रके समान बदलते हुवे रहते हैं। प्रयोजन यह कि-दो चक्रोंके समान ये द्यावा पृथिवी आपसमें जुड़े हुवे हैं। इस प्रकार ऋषि इस मन्त्रके द्वारा द्यावापृथिवीओंके महाभा- ग्यको कहता है।
हिन्दी निरुक्त । १११ इस प्रकार यह नैघण्टुक काण्ड समाप्त हुआ । इससे आगे ‘ऐकपदिक’ या ‘नैगम’ प्रकरण होगा । जिसका पहिला वाक्य ‘एकार्थमनेकशब्दम्’ यह है इति । व्याख्या । ( १ अ० ) उपमा दो प्रकार से आती है, एक शब्दोपमा जो पूर्व पादमें विस्तारसे दिखाई गई है ! दूसरी लुप्तोपमा या अर्थो- पमा, हैं । उपमाके स्थलमें उपमाके वाचक ‘इव’ आदि शब्दोंके रहनेसे शब्दोपमा होती है और इन्हीं इव आदि शब्दोंके लोपसे उपमा लुप्तोपमा कही जाती है । एवम् उपमा वाचक शब्दके न रहनेसे भी उसका अर्थ जो सादृश्य है प्रतीत होता है, इससे वही ‘अर्थोपमा’ कहलाती है । जैसे—‘सिंहो देवदत्तः’ अर्थात् सिंह सदृश देवदत्त है । यहाँ सिंह पदके आगे इव आदि उपमा वाचक शब्दके न रहनेसे भी उसका अर्थ सादृश्य प्रतीत होता है ।” अर्थोपमा दो प्रकारकी होती है, एक प्रशंसा में, और दूसरी निन्दामें । प्रशंसाके लिये ‘सिंह’ ‘व्याघ्र’ आदि शब्द दिये जाते हैं और निन्दाके लिये ‘श्वा’ ( कुत्ता ) ‘काक’ आदि शब्द होते हैं । जैसे ‘श्वा पुरुषः’ कुत्ते जैसा पुरुष है, इत्यादि— यद्यपि निघण्टुशास्त्रमें शब्दोपमाका ही पाठ है, किन्तु लुप्तोपमा- का नहीं इससे यहाँ भाष्यमें इसके दिखानेकी आवश्यकता नहीं थी, तथापि भाष्य ग्रन्थ विषयको विस्तारसे वर्णनके लिये ही होता है, अतः अवसर पानेसे अर्थोपमाका व्याख्यान भी कर दिया गया है । पक्षियोंके नामोंमें दो पक्ष हैं । (क) बहुत निरुक्ताचार्य मानते हैं कि-प्राय करके पक्षियोंके नाम शब्दके अनुकरण पर ही हैं, अर्थात् अर्थात् जो पक्षी जैसा शब्द करता है उसका नाम उसके समान ही होता है । जैसे काक ‘काँकाँ’ शब्द करता है इसीसे उसका नाम ‘काक’ है ।
१२२ ३ अ० ४ पा० ५२ खं० । (ख) औपमन्यव आचार्य मानते हैं कि—शब्दके अनुकरण पर कोई नाम नहीं होता, किन्तु सब नाम क्रियाके सम्बन्धसे धातु, प्रत्यय आदि संस्कार युक्त होते हैं। उसके अनुसार अपने पक्षियों तथा तिर्यक् (पशुओं) के कई नामोंकी व्युत्पत्ति भी दिखाई है। जैसे—काक तित्तिरि, कपिञ्जल [पक्षी] श्वा, सिंह, व्याघ्र। [पशु।] यद्यपि निरुक्त शास्त्र वेदाङ्ग है, और वैदिक शब्दोंके निर्वचनके अर्थ ही प्रवृत्त हुआ है, इससे इसमें सिंह, व्याघ्र, श्वा, काक ऐसे अर्वाचीन नामोंकी व्याख्या आचार्यको नहीं करना चाहिये थी, किन्तु निर्वचनके प्रकारको दिखानेके लिये कि-ऐसा भी निर्वचनका प्रकार है, इन शब्दोंकी व्याख्या की है। सिंह-‘सिंह’ शब्दमें ‘हिंस’ (रु० प०) धातुसे और सम् (उप०) तथा हन् (आ० प०) धातुके मेलसे व्युत्पत्ति कह कर दिखाया कि-शब्दोंके निर्वचन अनुलोम और प्रतिलोम दोनों प्रकार से होते हैं। पहिले निर्वचनमें हिंस् धातुके आदिका अक्षर अन्तमें आ जाता है और अन्तका आदिमें। इससे यह प्रतिलोम निर्वचन हुआ। तथा दूसरेमें सकार, हकार दोनों अक्षर जहाँके तहाँ रहे यही अनुलोम निर्वचनको प्रकार है। यह पक्ष वैयाकरणोंको भी सम्मत है। (३-१-५ खं०) इस खण्डसे पूर्व निघण्टु शास्त्रमें ऐसे ही नाम दिये हैं, जो एक एक वस्तुके बहुत बहुत नाम हैं, किन्तु यहाँसे ३ य ४र्थ, ५म खण्डोंमें एक एक वस्तुके दो दो नाम हैं, उनकी व्याख्या की है। एवम् इन्हीं शब्दोंके साथ नैघण्टुक काण्डकी समाप्ति भी हो जाती है। इसके आगे चौथे अध्यायसे दूसरा नैगम काण्ड आरम्भ होगा। “अमैनांश्चित्” मन्त्रसे अमैथुन सृष्टि जो पुराणोंमें प्रसिद्ध है, प्रमाणित होती है।
“ग्नास्त्वा” से वस्त्रके तैयार करनेकी क्रियाएं तथा उसमें स्त्री, बालक एवम् पुरुषोंका पृथक् पृथक् उपयोग दिखाया है । “पोयतिवा” मन्त्रमें राम कृष्ण आदि अवतारोंके होनेकी सूचना, तथा उनसे असुरोंके प्रतिकूल और सुरोंके अनुकूल बर्तावकी स्वाभाविकता आती है । ऐसी ऐसी अनेक बातें मन्त्रोंसे मिल सकती हैं, किन्तु अध्ययन करने वालेकी बुद्धि और ध्यान पर निर्भर है । इति हिन्दी निरुक्ते तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥ ३, ४ ॥ निरुक्तके तृतीयाध्यायका खण्ड सूत्र— [प्र० पा०] कर्मनामानि (१) परिषद्यं (२) नहिय- भाय (३) शासद्वन्हिः (४) अभ्रातेव (५) न जामये (६) [द्वि० पा०] मनुष्य-नामानि (७) तदद्य (८) दृषाव- निभ्यः (६) अभ्रातृं (१०) त्वयावयं (११) यथा सुपर्णा (१२) [तृ० पा०] बहुनामानि (१३) तनुत्यजे (१४) कुहश्चित् (१५) चतुरश्चित् (१६) प्रियमेधवत् (१७) [च० पो०] अथ लुप्तोपमानि (१८) अर्वंति (१९) दिशो (२०) रम्भः (२१) कतरा पूर्वा (२२) द्वाविंशतिः ॥ इति निरुक्ते पूर्वषट्के तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ (नैघण्टुकं काण्डं समाप्तम् ।) इति हिन्दी निरुक्ते तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥३॥ (नैघण्टुकं काण्डं समाप्तम् ।)
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❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ ❖ हिन्दी निरुक्त ❖ ❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖ ❧ नैगम काण्ड ❧ ❄ भूमिका ❄ —❖— समाम्नाय (निघण्टु) शास्त्र में नैघण्टुक, नैगम और दैवत ये तीन काण्ड हैं। इनमें "गौः" से "अपारे" पर्यन्त शब्दों का संग्रह रूप जो प्रथम तीन अध्यायों के परिमाण में नैघण्टुक काण्ड है, उसकी व्याख्या उसके भाष्य निरुक्त में विशेष रूपसे द्वितीय अध्यायके द्वितीय पाद् से तृतीय अध्याय की समाप्ति तक पूरी होगई है। अब नैगम काण्ड, जो "जहा" शब्द से "ऋबीसम्" शब्द पर्यन्त शब्दों का संग्रह रूप समा- म्नाय का चतुर्थ अध्याय है, उसकी व्याख्या निरुक्त के चतुर्थ, पञ्चम और षष्ठ (६ठे) अध्याय में होगी। इस काण्ड में "जहा" (६२) "सस्निम्" (८४) और "आशुशुक्षाणिः" (१३२) ये तीन खण्ड अर्थात् कुल दो सौ अठत्तर (२७८) शब्द हैं, उन में से प्रथम "जहा" खण्ड के बासठ (६२) शब्दों की व्याख्या क्रम से इस निरुक्त के चतुर्थ अध्याय में होगी। जैसे अमरकोश के प्रथम काण्ड में स्वर्ग आदि एक एक पदार्थके अनेक अनेक नाम हैं, उसी प्रकार समाम्नाय के प्रथम काण्ड में पृथिवी और हिरण्य आदि एक एक पदार्थ के अनेक
हिन्दी निरुक्त ( २ ) ४ अ० १ पा० १ खं० अनेक नाम हैं । एवम् अमरकोश के नानार्थ वर्ग में 'नाक' 'लोक' आदि शब्दोंके जिस प्रकार आकाश, स्वर्ग 'लोक' 'भुवन' आदि अनेक अनेक अर्थ बताये हैं, उसी प्रकार इस नैगम काण्ड में एक एक शब्द के अनेक अनेक अर्थ बताए गए हैं, तथा ऐसे शब्द, जिनके संस्कार आदि की प्रतीति नहीं होती, उनके संस्कार आदि का अवगम भी कराया गया है । सुतराम् इस काण्ड में अनवगत और अनेकार्थ शब्द व्याख्येय हैं । अवगत नाम जाने हुए और अनवगत नाम नहीं जाने हुए का है । किन्तु इस प्रकरण में अनवगत शब्द से वे शब्द लिये गए हैं, जिनके प्रकृति, (धातु) प्रत्यय, जाति आदि शब्द-धर्मों का अव- गामात्र से परिज्ञान नहीं होता । भगवद्दुर्गाचार्य ने इन अन- वगत शब्दोंके भेदोंकी एक सूची भी 'शिताम' शब्दकी टीकामें दी है । जिस शब्द में जिस धर्म की प्रतीति नहीं होती, वह उस धर्म से अनवगत कहा जाता है । जैसे-संस्कार (प्रकृति प्रत्यय आदि) की प्रतीति नहीं, तो संस्कारानवगत और जाति की प्रतीति नहीं, तो जात्यनवगत इत्यादि । अनवगत भेदों की उदाहरण सहित सूची । अनवगत भेद । उदाहरण । व्याख्या (१) पदजात्यनवगत । "स्व" नाम, या निपात? (२) अभिधेयानवगत । "शिताम" बाहु, यो यकृत् आदि ? (३) स्वरानवगत । "वनेनवायो" 'वने' 'न' का स्वर या 'वनेन' का ? (४) संस्कारानवगत । "ईशान्तासः" क्या धातु, और क्या प्रत्यय? (५) गुणानवगत । "करूलती" किसका गुण (विशेषण) ? (६) विभागानवगत । "मेहना" "मेहना" या "मे-इह-ना" ( नास्ति ) !
हिन्दी निरुक्त ( ३ ) ४ अ० १ पा० १ खं० अनवगत भेद उदाहरण व्याख्या (७) क्रमानवगत । “उपरमध्वं मे वचसे” देखो-नि० अ० २ पा०७ खं० ३ 'उप' मन्त्र के बीच से उठाकर आदि में जोड़ा गया है । (८) विक्षेपानवगत । “द्यावामः पृथिवी” (९) अध्याहारानवगत । “दानमनसो नो मनुष्यान् ” (१०) व्यवधानानावगत । “बायुश्चनियुत्वान् ” इसके अतिरिक्त कहीं एक पदके दो पद कर लिये जाते हैं, जैसे-“ पुरुषादः ” का ‘ पुरुषानेदनाय’। कहीं दो पद भी एक पद कर लिये जाते हैं,जैसे-“गर्भनिधानीं सनितुः” लोक में- “पश्यतो हरः” । एवम् आख्यात भी नाम कर लिया जाता है, जैसे-“ सर्वाणीन्द्रस्य धनानि विभक्ष्यमाणाः” लोक में-“पचत- भृज्जता” “खादतमंदता” इत्यादि । कहीं नाम भी आख्यात हो जाता है । जैसे-“सोमो अदाः” ( अ०५ पा० १ खं० ३ ) अश्नोति इत्यादि । इसी प्रकार मन्त्रों में शब्दों और अर्थों में अनेक प्रकार का संकर या मेल है, उसे वहां जैसा देखें वैसा करे । क्योंकि-वेदमें दृष्ट (देखे हुए ) के अनुसार विधि होती है। प्रयोजन यह है, कि-वैदिक शब्दों की काट छाट की विधि को वैदिक शब्द ही बताते हैं, उनके अनुशासन की विधि किसी लौकिक व्याकरण के अधीन नहीं है । इस अध्याय में जिस जहा खण्डके बासठ (६२) शब्दोंकी व्याख्या की जावेगी, उनमें ( १ ) आमि, ( २ ) रजः, ( ३ ) हेरः, ( ४ ) दयतिः, ( ५ ) ष्यन्तः ये पाँच ( ५ ) शब्द केवल अनेकार्थ हैं । ( १ ) नूचित्, ( २ ) नूच, ( ३ ) ऋधक ये तीन ( ३ ) शब्द निपात, एवम् अनेकार्थ है । यद्यपि इनके पाठ की इस गण में आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि-निपातों में
हिन्दी निरुक्त ( ४ ) ४ अ० १ पा० १ खं० संस्कार की विचारणा नहीं है और उनकी स्वतन्त्र व्याख्या भी प्रथमाध्याय के द्वितीय पाद में होचुकी है, तथापि इस प्रकरण में अनेकार्थ शब्द व्याख्येय हैं, उनकी समानता से यहां पर दिखा दिये गए हैं । ( १ ) मेहना, ( २ ) एरिरे, ये दो शब्द विभागानवत हैं । ( १ ) जरते, ( २ ) धयसे ( ३ ) वियुते ये तीन शब्द अर्थानवगत हैं । ( १ ) अस्याः ( २ ) अस्य, ये दो शब्द स्वरानवगत हैं । ( १ ) गौः, ( २ ) गातुः, इन दो पदों की व्याख्या पहिले आचुकी । ( १ ) नसन्त, ( २ ) परितक्म्या ( ३ ) शिप्रे इन तीन पदों की व्याख्या आगे होगी, और शेष इकतालीस (४१) शब्द सब अनवगत संस्कार हैं । अध्यायके अन्तमें मूल (समाम्नाय) शब्दों और प्रासंगिक शब्दों की सूचिएं भी दी जावेंगी, जिनसे इन शब्दों के अर्थ और निगम भी जाने जा सकेंगे ॥ शब्द समाधि । शब्द समाधि उसे कहते हैं, जिस में उसके प्रकृति (धातु) प्रत्यय ( विभक्ति और वचन आदि ) स्पष्ट प्रतीत होते हों, और वह किसी ऐसे शब्दके अक्षरों व अर्थ से समानता रखता हो, जिसके प्रकृति और प्रत्यय आदि स्पष्ट प्रतीत न होते हों अर्थात् परोक्षवृत्ति या अतिपरोक्षवृत्ति शब्द । प्रयोजन यह है कि-इस प्रकरणमें जितने मूल शब्द हैं, वे आपस में कोई किसी से पर्यायता नहीं रखते, इस लिये उनकी व्याख्या में शब्द समाधि ही एक उत्तम उपाय है, जिसके द्वारा सहजमें निश्चय हो जाता है, कि-इस शब्द की सृष्टि इसी प्रकार है, और इसका यह अर्थ होना उचित है । जैसे-'जहा' की शब्द समाधि 'जघान' है । जिसके द्वारा प्रतीत होता है कि-'जहा'
हिन्दी निरुक्त ( ५ ) ४ अ० १ पा० १ खं० में 'इन्' ( अदा०प० ) धातु और लिट् के प्रथमका एक वचन है। और 'मध्या' की 'मध्ये' इत्यादि । शब्द समाधि कब और किस प्रकार देना चाहिये ? जिस मन्त्र का परोक्षवृत्ति शब्द हो, उस मन्त्र की अर्थ परिज्ञान के लिये देखना चाहिये । जब उसके अन्य शब्दों का अर्थ और संगति प्रतीत होजावै वहां किसी एक शब्द के सं- स्कार या प्रकृति प्रत्यय आदि की प्रतीति नहीं, तो उस काल में जितना अर्थ वाक्य में अपूर्ण और एक शब्दगम्य हो उसे उस गूढ शब्द का अर्थ मानना चाहिए। अर्थ निश्चय के अन- न्तर ही इस शब्द समाधि का उपयोग होता है, जिससे कि- शिष्य को लाभ है। एक काण्ड का विषय दूसरे काण्ड में । जिस प्रकार दो तलघ्याओं का जल एक नालीके द्वारा मिलता हों, उसी प्रकार प्रथम दो काण्डों का विषय आपसमें मिल जाता है। प्रथम काण्डमें एक एक अर्थ में अनेक अनेक शब्द दिखाये हैं और दूसरे में एक एक शब्द स्वतन्त्र २ अर्थों में संग्रह किये हैं, किन्तु दो या अधिक शब्द एक अर्थमें नहीं। यही उनका विषय भेद है। तो भी शब्द स्वभाव उन दोनों काण्डों के विषयको मिला देता है। अर्थात् जो ही शब्द पर- स्पर की अपेक्षा भिन्न अर्थों को कहते हैं, वेही किसी एक अर्थ को कहने लगते हैं। और जो एक अर्थको कहते हैं, वेही आवश्यकतावश से भिन्न २ अर्थों को कहने लगते हैं। इस प्रगति के अनुसार जो ही शब्द भिन्नार्थकता की दशामें नैगम ( ऐकपदिक ) काण्ड में आजाते हैं, वेही समानार्थकता के अधीन नैघण्टुक काण्डमें चले आते हैं। यही दोनों काण्डोंका विषय संकर ( मेल ) है।
हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ४ अ० १ पा० १ खं० शब्दों की एकार्थता और भिन्नार्थता। जो लुढकता है, वह ढलान की ओर चलता भी है। जो उछैलता है, वह नीचे से ऊपर को चलता भी है जो गिरता है, वह ऊपर से नीचे को चलता भी है। जो सरकता है, वह धीरे २ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर चलता भी है। इस प्रकार एक ही क्रिया दो रूपों में दिखाई देती है, इस कारण से जब कोई किसी एक विशेष क्रिया को किसी शब्द से कहेगा, तो वह शब्द अवश्यं दो क्रियाओं की भी बोधन करेगा। इसके लिये फिर 'लुढकता है' आदि उक्त क्रियाओं पर ध्यान दी- जिये, जिनके प्रयोग से 'लुढकना' और 'चलना' दोनों क्रियायें प्रतीत होती हैं। प्रयोजन? जब इनका चलन अर्थ ही लेते हैं, तो ये अनेक शब्द एक अर्थ के वाचक होकर नैघण्टुक काण्डमें आजाते हैं, और जब विशेष २ अर्थों को कहने लगते हैं, तो भिन्नार्थक होकर नैगम काण्ड में चले आते हैं। इसी रहस्य के अनुसार भिन्नार्थकता के कारण नैगम काण्ड के विषय होने पर भी 'कसति' 'लोठते' 'श्च्योतते' इत्यादि बहुत से धातु ( निघ० अ० २ खं० १४ ) में गमनार्थक एक सौ बाईस ( १२२ ) धातुओं के मध्य में पढे गए हैं, जिससे उनका सामान्य रूपसे गमन-यह एक ही अर्थ होता है, तो भी प्रसिद्धि के अनुरोधसे पृथक् २ द्रव्यों की क्रिया के वाचक ही समझने चाहियें। जैसे- जो पुरुष कमर को ऊंची करके चलता है, वही 'कसति'-ऐसे कहा जाता है किन्तु अन्य नहीं,-जो खड़ा २ चलता है। जो ही कोई अचेतन लोहा आदि वा अन्य चेतन पुरुष आदि इच्छा के बिना ढलान में लुढकता है, वही 'लोटते' ऐसे कहा जाता है, किन्तु अन्य नहीं और ऐसे ही जब कोई द्रव द्रव्य या पिघली हुई वस्तु झरती है, तब वही 'श्च्योतते' ऐसे कही
हिन्दी निरुक्त ( ७ ) ४ अ० १ पा० १ खं० जाती है, किन्तु अन्य नहीं। इस प्रकार गमन अर्थ वाले धा- तुओं की एकार्थता होने पर भी प्रसिद्ध अर्थ में सामर्थ्य रखने के कारण उन धातुओं का गमन विशेषों में योग्यतानुसार नि- वेश जानना चाहिये, तथा ऐकपदिक भी समझना चाहिये। ध्यान रहे कि-एक स्थान से दूसरे स्थान में प्राप्ति जो चलन से होती है, वह सब गतियों का एकसा कार्य है, इसी से उन सबकी एकार्थता कही है। क्यों कि-‘सामान्य अर्थ के वाचक शब्द कहीं विशेष अर्थ के वाचक होजाते हैं, और वि- शेष अर्थ के वाचक कहीं सामान्य अर्थ के वाचक। नैगम काण्ड की व्याख्या का स्वरूप। “तत्वं पर्यायशब्देन व्युत्पत्तिश्च द्वयोरपि निगमो निर्णयश्चेति व्याख्येयं नैगमंपदे” अर्थात् पर्याय शब्द से तत्व (अर्थ) करना। मूलशब्द और उसके पर्याय दोनों की व्युत्पत्ति करना। निगम देना। और उसका निर्णय करना। इसके अतिरिक्त ‘दयति’ ‘अकूपार’ आदि पदों को स्थान बना कर उनके उपदया, दान, हिंसा आदि अनेक अर्थों को बताना, तथा इन उपदया, दान, हिंसा आदि अनेक अर्थों का एक शब्द से वाच्य सिद्ध करना ऐसी व्याख्या भी इस काण्ड में होगी। दो व्याख्याएं। इस कांड में संक्षेप से दो व्याख्यायें हैं। एक-नहीं प्रतीत होते हुये अर्थ को पर्याय शब्द देकर विभाग पूर्वक प्रतिपादन करना। और दूसरी शब्दकी व्युत्पत्ति करना। पहिली व्याख्या, का प्रयोजन अर्थ का परिज्ञान है, और दूसरी का शब्द-परि- ज्ञान। यह दोनों प्रकार की व्याख्या इस नैगम काण्ड में यथासंभव दी जावेगी।
हिन्दी निरुक्त ( ८ ) ४ अ० १ पा० १ खं० ऐकपदिक नाम का प्रयोजन । पहिले काण्ड में एक एक अर्थ के वाचक पद समूह के समूह पढे गए हैं, और इस प्रकरण में एक एक अर्थ का ज्ञापक एक एक ही पद रखा गया है, जैसे-'जहा' 'निधा' इत्यादि, इसी से इस काण्ड का नाम 'ऐकपदिक' (एक एक पद से रचित) पूर्वाचार्य्यं ने धरा है। मन्त्रों में पदों का अध्याहार । भाष्यकार यास्क मुनि मन्त्रों की व्याख्या में पदों को अध्याहार करते ( ऊपर से लेते) हैं । जैसे-(नि० अ० ४ पा० १ खं० २) “कोनुमर्य्या” मन्त्रमें “को अस्मदीषते” की व्याख्या में “कः अस्मद् भीतः पलायते' यहां 'भीतः' पद का अध्याहार किया है । एवम् (नि० अ० ४ पा० १ खं० ६-) “संमातपन्ति” मन्त्र में “शिरश्ना व्यदन्ति” वाक्यमें 'सूत्राणि' पद, (नि० अ० ४ पा० १ खं० ८-) “मरुत्वां इन्द्र” मन्त्र में “वृषभः” की व्याख्या में 'अपाम्' पद, और “मदाय” की व्याख्या में 'जैत्राय' पद, (नि० अ० ४ पा० २ खं० ४-) “इन्द्रेण संहिदृक्षसे” मन्त्र में “अभिभ्युषा” की व्याख्या में 'गणेन' पद, (नि० अ० ४ पा० ३ खं०५) “अथानः शंयोः” मन्त्र में “शंयोः” पदकी व्याख्या में 'रोगाणाम्' 'भयानाम्' ये दो पद अध्याहार किये हैं । इस से यह सिद्ध हुआ कि-मन्त्र में अर्थ के अविरोधि पद अध्याहार करने चाहिएं । यह आवश्यक भी है । क्यों कि-मन्त्रोंमें प्रायः अधूरे वाक्य बहुत हैं, यदि उन में ऐसा नहीं किया जायगा, तो उनकी अर्थवत्ता ही न रहेगी ॥ समाम्नाय और निरुक्त का एक कर्त्ता (प्रश्नः) “विद्याम तस्य” (नि० अ०४ पा०३ खं०२) इस मन्त्र
हिन्दी निरुक्त ( ९ ) ४ अ० १ पा० १ खं० में 'अकूपारस्य' 'दावने' इन दोनों पदों का इसी अनुक्रम से पाठ है, और समाम्नाय में 'दावने' (३२) 'अकूपारस्य, (३३) इस प्रकार मन्त्रपाठ के विपरीत पाठ है। इससे जाना जाता है कि-अन्य ही ऋषियोंने समाम्नायका समाम्नान (विरचन) किया है, और अन्य ही यह भाष्यकार है। क्यों कि यदि एक ही पुरुष समाम्नान और भाष्य को करता, तो प्रयोजन के विना ही एक मन्त्र-स्थ दो पदों के पाठ क्रम को न बदलता । (उत्तर-) समाम्नाय में जो शब्द पढे हुए हैं; वे किसी मन्त्रार्थों के अनुरोध से नहीं पढे गये हैं, किन्तु, स्वतन्त्रतासे सब पठित हैं, इस लिये उन शब्दों में संयोगवशात् दो पद एक मन्त्र में आगए और उन को भाष्यकार मन्त्रोक्त क्रम से ही व्याख्या करते हैं, इस से दोनों ग्रन्थों के एक आचार्य होने में भी कोई दोष नहीं है। भगवद्दुर्गाचार्य का यही समाधान पञ्चम अध्याय में 'वाजपस्त्यम् ( ४६ ) वाजगन्ध्यम् ( ५० ) इन दो शब्दों का भी हो सकता है। २
हिन्दी निरुक्त ( १० ) ४ अ० १ पा० १ ख० इस अध्याय के निघण्टुस्थ शब्दों की निरुक्तस्थ संक्षिप्त व्याख्या
| निघण्टु-स्थ सं० | अनेकार्थ | तत्व (अर्थ) अवगम | निगमः |
|---|---|---|---|
| ४६ | जामिः (४) | अतिरिक्त नाम। वालियाः। भगिनी।<br>असमानजातीयावा (पा० ३ख०४) | “यत्रजामयः कृणवन्नजामि” |
| ३६ | रजः (२) | रजतेः। ज्योतिः। उदकम्। लोकाः।<br>असृगहनी। (पा० ३ख०३) | |
| ४० | हरः (३) | हरतेः। ज्योतिः। उदकं। लोकाश्च<br>(पा = ३ख०३) | “अग्नेयत्तेहरः” |
| २६ | द्यतिः (१) | उपदाया दान विभाग दहन हिं-<br>सार्थः। (पा० ३ख० १) | (१) “नवेनपूर्वद्दयमानानाः” । २।३ “द्यएतच्छद्<br>विद्यते” (४) “दुर्वर्त्त भीमोद्यते” (५)<br>“विद्दुद्द्युद्द्यमानौविशञ्चन्” । |
| ४२ | व्यन्तः (४) | (अनेकार्थधातुप्रकृतिः) (पा० ३<br>ख०३) | “पदेषुदेवस्य नमसा व्यन्तः” । |
निपात
हिन्दी निरुक्त ( ११ ) ४ अ० १ पा० १ ख० ३० नूचित् } [अनेकार्थत्वादिह समाम्नातः निपातानां संस्कारोनास्ति ।] ३१ नून } पुरातनवयोरर्थयोः । (पा० ३ ख० १) ६० ऋधक् पृथक् । (पा० ४ ख० ४) "ऋधगया ऋधगुताशमिष्ठाः" विभागानवगत ४ मेहना मंहनीयम् । मे इह न अस्ति । "यदिन्द्रचित्र मेहना" (पा० १ ख० ४) ५० एरिरे आ-ईरिरे। 'ईरितिः' (अदा०आ०) उ- "यमेरिरे भृगवः" पसृष्टोऽभ्यस्तः। (पा० ४ ख० २) अर्थानवगत ५२ जरते स्तौति । (पा० ४ ख० ३) "इन्धान एनं जरते स्वाधीः" ५८ चयसे चातयसि । (पा० ४ ख० ४) ५६ वियुते द्यावापृथिव्यौ । (पा० ४ ख० ४) "सामान्या वियुते दूरे" स्वरानवगत ६१ अस्याः अस्यै । (पा० ४ ख० ४) "अस्या उषसः" ६२ अस्य 'अस्याः' इत्येतेन व्याख्यातम् । "अस्य वामस्य पलितस्य" (पा० ४ ख० ४)
हिन्दी निरुक्त ( १२ ) ४ अ० १ पा० १ ख०
| निघण्टु-स्थ सं० | अनेकार्थ | तत्व (अर्थ) अवगम | निगमः |
|---|---|---|---|
| व्याख्यात | |||
| ५४ | गौः | व्याख्यातः [नि०अ०२पा०२ख० १] (पा०४ख०३) | “अत्राहगोरमन्वत” |
| ५५ | गातुः | व्याख्यातः । (पा०४ख०४) | |
| व्याख्यास्यमान | |||
| ११ | शिप्रि | हनूनासिके । (पा०२ख०२) | |
| २२ | नसन्त | द्वादशाध्याये । (पा०२ख०७) | |
| २७ | परितक्म्या | षोडशाध्याये । (पा०ःख०८) | |
| अर्थसंस्कारोभयानवगत और अनैकार्थ | |||
| ३ | शिताम | दोः (बाहुः) । योनिः, शाकपूणेः। श्यामः, तटीकेः श्वेतमांसं, गालवस्य । |
हिन्दी निरुक्त ( १३ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
संस्काराननवगत १ जहा | जघान । [पा० १ खं० १] | “जहा को अस्मद्दोषिते', २ निधा | पाश्या । यन्निनिधीयते सा नि- | “समुष्यस्मान्निधयेव बद्धान्” | धा । [पा० १ खं० २] | ५ दमूनाः | दममनाः । दान्तमनावा । दान- | “जुष्टो दमूनाः ” | मनावा । [पा० १ खं० ३] | ६ मषः | मशिकाः । (बहुवचनम्) (मद्- | “मषो न शिरना व्यदन्ति ।” | मषी । मषः ।) | ७ इषिरः | ईषणवान् । एषणवान् । | “इषिरेण ते मनसा ” | (पा० ६ खं० ७) | ८ कुरुतम | कुरुत । 'न' इति अनर्थकः । | | “अनर्थका उपजना भवन्ति” । | ९ जठरम् | उदरम् । जग्धमस्मिन् ध्रियते | “आसिञ्चस्वजठरे” । | धीयते वा । (पा० १ खं० ७) | १० तितउ | परिपवनं भवति । ततवद्वा । तुन्न- | “सक्तुमिव तितउना” | वद्वा । तिलमात्रतुन्नमितिवा । | १२ सध्या | सद्ध्ये । (पा० २ खं० ३१) | “सध्या कत्तौर्विवतं संजभार” ।
हिन्दी निरुक्त ( १४ ) ५ अ० १ पा० १ खं०
| निघण्टु-स्थ सं० | अनेकार्थ | तत्व (अर्थ) अवगम | निगमः |
|---|---|---|---|
| १३ | मन्दू | मदयितृ । मन्दना इत्येके।<br>(शब्दसमाप्तौ) [पा० २ खं० ४] | " मन्दू समानवर्चसा" |
| १४ | हेर्मोन्तसः | सम्भीरित्तान्तः। पृथुवन्तावा ।<br>(शब्द समाधौ) [पा० २ खं० ५] | " हेर्मोन्तसः" |
| १५ | कायमानः | क्रोयमानः। कामयमानो वा ।<br>[पा० २ खं० ६] | "कायमानो वना त्वम् " |
| १६ | लोधम् | लुब्धम् ।<br>(पा० २ खं० ६) | "लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः" |
| १७ | शीरम् | (अग्निः ।) अनुशयिनम् आशयिनम् वा । (पा० २ खं० ६) | "शीरं पावकशोचिषम् " |
| १८ | विद्रधे | विदे । (पदं अनेकार्थम् ।)<br>(पा० २ खं० ७) | "कनीनकेवविद्रधे " |
| १९ | दृपदे | द्रुममये । (पादुके)<br>(पा० २ खं० ७) | "नवेद्रुपदे अर्भके" |
| २० | त्व | तीर्थम् । तूर्णामतद् प्रायन्ति इति<br>शब्द समाधिः । (पा० २ खं०७) |